‘अलगाव, मनमुटाव और तलाक’ समस्या एक-कारण अनेक

‘अलगाव, मनमुटाव और तलाक’ समस्या एक-कारण अनेक

talak2अलगाव, मनमुटाव और तलाक जैसी समस्याओं से ग्रस्त आज का समाज ज्ञानशून्य सा होता जा रहा है। बदलते वक्त के साथ आज शादी करना भी मानो जरूरी नहीं रहा। बिना शादी के भी लोग लम्बी जिंदगी संग साथ गुजार लेते हैं और उन्मुक्त शैली से प्रभावित मौज मस्ती की चाहत में अपने लाइफ पार्टनर के प्रति ऋणात्मक दृष्टिकोण अपनाने लगे हैं।
यही कारण है कि जो भी पक्ष व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रहार होते महसूस करता है उसका अहम् कुंठित हो जाता है। मन जोर-जोर रोने, चीखने लगता है और फिर प्रारंभ होती है पहले मनमुटाव, फिर अलगाव और अंत में तलाक जैसी स्थिति।
आज देश के कोने-कोने से आवाज उठ रही है। समाज शास्त्री और मनोवैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि अधिकांश परिवार, जो मौजमस्ती और उन्मुक्त जीवन शैली में विश्वास रखने लगे हैं, कपड़ों की तरह पार्टनर, दोस्त, सहेली बदलना जिनका शगल बनता जा रहा है, उनमें शादी के जल्द बाद ही अलगाव और फिर तलाक की नौबत आ जाती है।
आज स्थिति यह हो रही है कि स्त्री-पुरूष दोनों को ही शराब, शैम्पेन, सिगरेट, पीने व पिलाने में आनंद आने लगा है। घर से अधिक उन्हें क्लब, ताश, जुआ आदि भाते हैं।
अब तो देखा देखी स्वयं को आधुनिक समझने वाली महिलाओं, युवतियों में भी ताश व किटी पार्टियों के प्रति मोह बढ़ता जा रहा है। घर परिवार से ज्यादा उन्हें विंडो शापिंग में मजा आने लगा है। जरूरत हो या न हो, नौकरी पर जाना, बिजनेस करना उन्हें रास आने लगा है।
बच्चों की समस्या तो वे होस्टल या क्रेच में भेजकर निपटा लेना चाहती हैं। यही कारण है कि एक दूसरे के चरित्र को संदेह के कटघरे में खड़ा
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कर स्वयं को बेचारा/बेचारी महसूस कर किसी दूसरे के कंधे पर सिर रखकर मगरमच्छ के आँसू बहाना भी आज के पति-पत्नी को ज्यादा रास आने लगा है और ऐसे में ही तीसरे का अभ्युदय होता है।
आज पति-पत्नी दोनों ही किसी दूसरे की चाहत ज्यादा महसूस करने लगे हैं और पति-पत्नी से कम लगाव और अपनत्व तथा किसी तीसरे में ज्यादा आकर्षण महसूस करने लगे हैं। आज बच्चों का मोह भी दोनों को एक-दूसरे से बांध नहीं पाता।
ऐसे पति-पत्नी, जो समाज और सामाजिक व्यवस्था से भय खाते हैं, वे औपचारिक रूप से संबंधों को निभाते और एक-दूसरे की कमजोरियों को नजरअंदाज करते हुए चलते रहते हैं। कारण वही समाज में दूध के धुले बने रहने की चाहत या फिर आदर्श पति-पत्नी बनने और दिखने की अभिलाषा।
ऐसे लोगों के जीवन की गाड़ी बड़े आराम से सरपट भागती है। उन्हें आपस में एक-दूसरे से कुछ लेना-देना नहीं होता। फिर भी कभी घर के बड़े बुजुर्गों की खातिर तो कभी आपसी समझौते के कारण वे एक-दूसरे के प्रति नकारात्मक रूख नहीं अपनाते बल्कि एक सच्चे मित्र की तरह समय-समय पर एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं।
भले ही साल भर प्यार न करें मगर बर्थडे और एनिवरसरी विश करना नहीं भूलते। तीज त्यौहार पर एक दूसरे को मनपसंद गिफ्ट भी प्रेजेंट करते हैं और जरूरत पडऩे पर तीमारदारी करने में भी पीछे नहीं रहते लेकिन कुछ संगदिल कठोर हृदय पति-पत्नी आपस में समझौता नहीं कर पाते।
उनका अह्म, उनका ईगो ज्यादा बलवान् होता है। एक दूसरे की छोटी-छोटी गलतियों और खामियों को भी वे बहुत बड़ा करके देखते और समझते हैं तो क्लेश और मनमुटाव ज्यादा बढ़ जाता है। झगड़े भी उन्हीं पति-पत्नी में ज्यादा होते हैं जो एक दूसरे से किसी भी कीमत में दबना नहीं चाहते। भले ही वे गलत ही क्यों न हों मगर आपसी समझौते को गुलामी का नाम देते हैं। ऐसे में मुक्त जीवन के आकांक्षी स्त्री पुरूष दूसरों की दखलंदाजी अपनी दैनिक रुटीन लाईफ में सहन नहीं कर पाते।
आज सबसे बड़ी मुसीबत और पारिवारिक विकृति व विघटन का एक कारण यह भी है कि अनेक आधुनिक पति-पत्नी विवाह को आजादी और खुले रोमांस का और दूसरों से फ्री सेक्सुअल संबंध बनाने का पासपोर्ट समझने लगते हैं। पति, पत्नी की सहेलियों से फ्लर्ट करने से नहीं चूकते।
इसी तरह महिलाएं भी ऑफिस में सहकर्मियों से या बास से नैन मटक्का करना अपना अधिकार समझती हैं। ‘हम किसी से कम नहीं’ के
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चक्कर में युवक क्या, युवतियाँ क्या, दूसरों से नाजायज संबंध बनाने लगे हैं जबकि शादी तो खुशी से किया एक वादा होता है, जिसे धर्म समझ कर जिंदगी भर निभाना चाहिए। शारीरिक और मानसिक स्वच्छता की चाहत एक बीमारी ही तो होती है जिसका इलाज भी आदमी विशेष के ही पास होता है।
मन से अपनों के प्रति प्रेम भावना ही जीवन में किसी को गलत काम करने और गलत राह पर चलने से रोक सकती है वर्ना मानसिक विकृतियों से ग्रस्त युवक-युवती, स्त्री-पुरूष न केवल अपनी जिंदगी को भार बना बैठते हैं बल्कि अलगाव और मनमुटाव की राह पर चलकर तलाकमय जीवन बिताने को भी बाध्य हो जाते हैं।
बाद में भले ही प्रौढ़ावस्था में अकेलेपन के एहसास से ग्रसित हो जायें, तब जवानी में जो आपके देह, रंग, रूप और पाकेट से आकर्षित होते/होती हैं।
कोई भी साथ नहीं देता। परिंदे उड़ जाते हैं और आप मायूसी के आलम में देखते रह जाते हैं। शालीनता और समझदारी इसी में है कि अपने जीवनसाथी से निभाना और मानसिक रूप से जुडऩा सीखा जाये और जीवन रूपी साथ को खुशियों के रास्ते पर सरपट दौड़ा दिया जाये ताकि अलौकिक सुख की प्राप्ति हो सके।
– सेतु जैन

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