‘अरोमाथेरेपी’ सुगंध जो करे रोगों का इलाज…

‘अरोमाथेरेपी’ सुगंध जो करे रोगों का इलाज…

विभिन्न रोगों के इलाज में भिन्न-भिन्न पद्धतियां हैं और आजकल क्लीनिकल अरोमाथेरेपी इलाज का एक बेहद प्रचलित तरीका बना हुआ है। अरोमाथेरेपी दो रूपों में अधिक प्रचलित हैं-क्लीनिकल अरोमाथेरेपी और कास्मेटिक अरोमाथेरेपी।
कास्मेटिक अरोमाथेरेपी व्यक्ति की भावनाओं को प्रभावित करती है जबकि क्लीनिकल अरोमाथेरेपी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है व कई रोग दूर करने में सहायक है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रकृति ने हमें बहुत से ऐसे तेल दिए हैं जिनके प्रयोग से न केवल हम अच्छा महसूस करते हैं बल्कि ये कई रोगों से सुरक्षा भी देते हैं।
कई गुणकारी पौधे ऐसे हैं जिनका प्रयोग कई औषधियां बनाने में किया जाता है और इन्हीं के आयल में कई रोग दूर करने की क्षमता विद्यमान है।
अरोमाथेरेपी द्वारा मोटापे, गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप की समस्या, रजोनिवृत्ति के समय होने वाले हार्मोन परिवर्तन, एलर्जी व उच्च रक्तचाप का भी इलाज संभव है। अरोमाथेरेपी, मस्तिष्क में लिम्बिक सिस्टम जिसमें कई प्रकार के ग्लैण्डस होते हैं, को प्रभावित करती है। यह सिस्टम तनाव, चयापचय क्रिया को भी नियंत्रित करता है। लिम्बिक सिस्टम मस्तिष्क के अन्य हिस्सों से भी जुड़ा होता है। ये हिस्से कई महत्त्वपूर्ण प्रक्रियाओं जैसे हृदय गति, श्वासक्रिया, रक्तचाप, याददाश्त, स्टे्रस हार्मोन्स को नियंत्रित करते हैं। स्टे्रस को दूर करने, ग्लैण्डस या ग्रन्थियों को उत्तेजित करने में आयल मसाज व विभिन्न प्रकार के तेलों की खूशबू विशेष भूमिका निभाती है।
हमारे मस्तिष्क को सबसे तेज पहुंचने वाला रास्ता है हमारे सूंघने की शक्ति और अरोमाथेरेपी द्वारा विभिन्न खुशबुएं मस्तिष्क को पहुंचती हैं। आयल मसाज या किसी आयल की तेज खुशबू के साइड इफेक्टस ज्यादा गंभीर नहीं हैं।
ये साइड इफेक्ट सभी उन व्यक्तियों को हो सकते हैं जिनकी त्वचा बहुत ही कोमल हो और तेज खुशबू से सिरदर्द या जी मिचलाना हो सकता है।
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अरोमाथेरेपी में प्रयोग किए जाने वाले आयल्स में विशेष गुण पाए जाते हैं। इनका प्रयोग स्नान करते समय, रूम स्प्रे में, परफ्यूम के रूप में मसाज, गरारे करते समय आदि विभिन्न तरीकों द्वारा किया जाता है। तुलसी (बेसिल) नारंगी (बर्गामोट) काली मिर्च, केमोमाइल, यूकलिप्टस (मेंहदी की जाति का एक वृक्ष) लेमन पेपरमिंट, रोजमेरी, चंदन जरेनियम व लेवेंडर आयल मुख्य हैं।
तुलसी का तेल दिमाग शांत करता है डिप्रेशन दूर करता है व पाचन संबंधी कई शिकायतों में फायदेमंद है। नारंगी ताजगी देती है व ब्रोंकाइटिस रोग में फायदेमंद है। इसका प्रयोग रूम फ्रेशनर के रूप में भी किया जाता है। काली मिर्च या ब्लैक पेपर का प्रभाव उत्तेजित करना वाला होता है व श्वास संबंधी रोगों और कई दर्दों को दूर करने में इसका प्रयोग किया जाता है। इसे मसाज आयल के रूप में प्रयोग किया जाता है। केमोमाइल का प्रयोग इसमें पानी मिलाकर किया जाता है। बच्चों में होने वाली उदर पीड़ा में किया जाता है। यूकलिप्टस एक एंटीसेप्टिक है व दर्द आदि में इसका प्रयोग फायदेमंद है। जरेनियम हार्मोन संबंधी शिकायतों व तनाव को दूर करता है।
लेवेंडर का प्रयोग पेनकिलर, एंटीसेप्टिक, एंटी बैक्टीरियल, एंटीफंगल व एंटीवायरल विभिन्न रूपों में किया जाता है। लेमन एक अच्छा पेनकिलर है व ताजगी देता है। रोजमेरी मांसपेशियों, जोड़ों व पैरों की थकावट को दूर करता है। चंदन का प्रयोग त्वचा संबंधी रोगों में किया जाता है। फंगस इंफेक्शन होने पर टी-ट्री आयल का प्रयोग बहुत फायदेमंद है।
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इन आयल के प्रयोग में कुछ सावधानियां बरतनी आवश्यक है। इन विशेष आयल का सीधे शरीर पर प्रयोग नहीं करना चाहिए। ये उडऩे वाले होते हैं इसलिए इन्हें किसी वनस्पति आयल जैसे सनोला, नारियल या बादाम के तेल में मिश्रित किया जाता है। एक टी स्पून वनस्पति आयल में 2-3 बूंदें मिश्रित कर इसे शरीर पर लगाया जाता है।
जिन आयल का प्रयोग सूंघने में किया जाता है उसके लिए टिश्यू में कुछ बूंदें डालकर सांस खींचने की प्रक्रिया द्वारा शरीर के भीतर लिया जाता है। लेवेंडर आयल का प्रयोग बहुत अधिक नहीं करना चाहिए। यह हर शरीर पर अलग-अलग कार्य करता है।
अनीमिया व रक्तचाप कम होने पर रोज़मेरी आयल बहुत प्रभावकारी है। इस आयल का प्रयोग माथे पर, कलाई, कानों के पीछे, पैरों पर किया जा सकता है। नासिका संबंधी शिकायतों पर नियंत्रण पाने में दो बूदे पिपरमिट आयल प्रभावकारी है।
– सोनी मल्होत्रा

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