अमेरिकी चुनाव : पहली बार विकल्पों का अभाव !

अमेरिकी चुनाव : पहली बार विकल्पों का अभाव !

102_12_52_56_trump-hillaryसाल 1988 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला रिपब्लिकन जॉर्ज डब्ल्यू. बुश और डेमोक्रेट माइकल डुकाकिस के बीच था। उस चुनाव के एक स्टिकर ने तब देश के मूड को उजागर किया था- ‘शुक्र है कि हमें सिर्फ इन्हीं दोनों में से एक को चुनना है! जाहिर है, वह बेहद लोकप्रिय हुआ था। पिछले साल हिलेरी क्लिंटन व डोनाल्ड ट्रंप के बीच में से किसी एक को चुनने का ख्याल करके मेरे भीतर कुछ वैसे ही भाव उभरे थे, और अगले मंगलवार को मुझे इन्हीं दोनों में से किसी एक को चुनना होगा। आज रात मैं न्यूयॉर्क के अपने घर के लिए निकलूंगा, ताकि राष्ट्रपति चुनाव में वोट डाल सकूं, जो मेरी याददाश्त में सबसे भद्दा और विभाजक राष्ट्रपति चुनाव है।मैं न्यूयॉर्क न जाने का फैसला कर सकता था। मैं यह भी सोच सकता था कि मेरा वोट कोई खास मायने नहीं रखता: आखिर न्यूयॉर्क डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति वफादारी रखने वाला सूबा है, और क्लिंटन के लिए इसके 29 ‘इलेक्टोरल वोट लगभग पक्के हैं। गौरतलब है कि अमेरिका में तमाम सूबों के लिए ‘इलेक्टोरल वोट तय हैं, जो कि उनकी आबादी के हिसाब से हैं। जो उम्मीदवार लोकप्रिय वोटों की दौड़ में आगे रहता है, उस सूबे के सारे ‘इलेक्टोरल वोट उसके हो जाते हैं। फिर मैं क्यों जा रहा हूं? मेरे भीतर का नागरिक अपना यह फर्ज महसूस करता है कि मैं एक स्पष्ट चयन करूं। मैं यह काम नई दिल्ली से भी कर सकता था, क्योंकि अमेरिकियों को इस बात की इजाजत है कि वे दूरस्थ मतदान के जरिये अपने वोट डाल सकें। मगर मेरे भीतर का पत्रकार उस मौके का गवाह बनने से खुद को रोक न सका, जो न सिर्फ अमेरिका के लिए ऐतिहासिक पल होने जा रहा है, बल्कि काफी मुमकिन है कि पूरी दुनिया के लिए भी यह ऐतिहासिक साबित हो।इत्तिफाक से इस साल यह दूसरा मौका होगा, जब मैं एक ऐसी वोटिंग के दौरान उस देश में मौजूद रहूंगा, जिसके नतीजे पूरी दुनिया के ऊपर असर डालेंगे। पहली वोटिंग यानी 23 जून को मैं लंदन में था। इसी दिन ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तरह ‘ब्रेग्जिट की रायशुमारी के पहले भी एक बेहद भद्दा अभियान चला था। उसमें एक पक्ष नस्लवादी और बाहरी लोगों से खुल्लमखुल्ला नफरत करने वाला था, वह अनाप-शनाप वादे किए जा रहा था, जबकि दूसरा पक्ष आत्ममुग्ध-सा अपनी जीत के प्रति आश्वस्त था, और मतदाताओं से संपर्क बनाने की उसकी कोशिशें बेतरतीब थीं।ब्रेग्जिट के नतीजे ने लंदन को भौंचक्का कर दिया था- लगभग खामोश होने की हद तक। मैंने इसे वाकई महसूस किया था, क्योंकि पूरा पड़ोस नतीजे आने के पहले दिन के मुकाबले सन्नाटे में था। नस्लवादी व विदेशियों को नापसंद करने वाले जीत गए थे, जबकि आत्म-संतोषी और अपनी जीत के प्रति आश्वत भीड़ यह सोचकर स्तब्ध थी कि आखिर इतनी बड़़ी तादाद में साथी देशवासियों ने अपने चुनाव में लापरवाही कैसे बरती? मैं उम्मीद करता हूं कि 9 नवंबर को न्यूयॉर्क की मनोदशा वैसी नहीं होगी।बहरहाल, विकल्प की जिन चुनौतियों से अमेरिकियों का इस बार साबका पड़ा है, उस पर लौटते हैं। साल 1988 के उस लोकप्रिय स्टिकर ने मतदाताओं से संवाद कायम करने में दोनों उम्मीदवारों की अयोग्यता को उजागर किया था। बुश सीनियर और डुकाकिस काफी सुस्त प्रतिद्वंद्वी थे और वह चुनाव अभियान काफी उबाऊ था। लेकिन इस बार हमारे सामने बिल्कुल उल्टी समस्या है। इस बार का चुनाव अभियान काफी उत्तेजक और रोंगटे खड़े कर देने वाला रहा है।आप डोनाल्ड ट्रंप को चाहे कुछ भी कहें, उन्हें सुस्त नहीं कह सकते। इसी तरह, हिलेरी क्लिंटन भले ही राजनेताओं में सबसे करिश्माई न हों, दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क की पहली महिला राष्ट्रपति बनने की संभावना ही इसकी कुछ हद तक भरपाई कर देगी। लेकिन यह चुनावी मौसम यदि शोखी के लिहाज से लंबा रहा, तो प्रेरित करने वाली घटनाओं के नजरिये से उतना ही छोटा। दोनों में से किसी उम्मीदवार ने अमेरिका के ‘मर्म’ को नहीं स्पर्श किया। बल्कि उन्होंने इसकी कोशिश भी नहीं की। ट्रंप भय और नफरत की तिजारत में लगे रहे, तो हिलेरी आगाह करने में जुटी रहीं। ट्रंप का पैगाम यह है कि ‘मुझे वोट कीजिए, वरना आपकी दुनिया तबाह हो जाएगी। वहीं हिलेरी ने संदेश दिया है कि ‘मुझे चुनिए, क्योंकि अगर आपने उन्हें वोट दिया, तो आपकी दुनिया खत्म हो जाएगी।ट्रंप असभ्य मर्द हैं- एक यौन उत्पीड़क, लगातार झूठ बोलने वाले, और टैक्स-पैंतरेबाज। वह एक ऐसे इंसान हैं, जो अपने सबसे करीबी लोगों तक की परवाह नहीं करते। हिलेरी डरपोक हैं- वह एक ऐसी महिला हैं, जो किसी से पैसे ले लेंगी और सत्ता पाने या उसे बनाए रखने के लिए कुछ भी कह सकती हैं। हिलेरी के पास सत्ता में होने का अनुभव है, लेकिन जब से वह क्लिंटन खानदान की अगुवा बनी हैं, उनका रिकॉर्ड एक ऐसी नेता का रहा है, जो कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहती और मुश्किल फैसलों से बचने की कोशिश करती है। जबकि अमेरिका (या पूरी दुनिया) को इस वक्त इसकी दरकार है। यह न सिर्फ निराश करने वाली, बल्कि खतरनाक बात है कि दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र को अपने शिखर पद के लिए सिर्फ यही दो शख्सीयतें माकूल लगीं। इसलिए हैरानी की बात नहीं कि कुछ सर्वेक्षणों में ये दोनों अब तक के सबसे फीके प्रतिद्वंद्वी माने गए हैं।फिर किस आधार पर इन दोनों में से किसी एक को मुझे चुनना चाहिए? काफी सारे अमेरिकियों की तरह मैं भी इस सवाल से महीनों जूझता रहा हूं। जाहिर है, वोटिंग से नदारद रहने का विकल्प मेरे पास नहीं है- हाशिये पर बैठे लोगों के लिए यह चुनाव काफी अहम है। कुल जमा मेरे सामने जो तस्वीर है, उसमें मैं देख सकता हूं कि हिलेरी क्लिंटन के राष्ट्रपतित्व में अमेरिका, बल्कि दुनिया के किसी बेहतर मुकाम तक पहुंचने का बहुत भरोसा नहीं है, मगर मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से सब कुछ बदतर हो जाएगा। वोटिंग स्टेशन तक इसी खराब मनोदशा के साथ जाना होगा। लेकिन मुझे पता है कि इससे भी अधिक निराशा मुझे मतदान के बाद होने वाली है। जो लोग विजेता को वोट करेंगे, उनमें से काफी सारे जल्दी ही पछता रहे होंगे। इसलिए मुझे एक आइडिया सूझा है कि 9 नवंबर की सुबह से मैं एक स्टिकर बेचना शुरू कर दूं कि ‘इससे भी बुरा हो सकता था: हमने दूसरा विकल्प चुना।(यह लेखक के निजी विचार है।)-बॉबी घोष

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