अमर और रामगोपाल, इन दोनों की ‘टशन’ में ही उलझे हैं पिता-पुत्र के रिश्ते!

अमर और रामगोपाल, इन दोनों की ‘टशन’ में ही उलझे हैं पिता-पुत्र के रिश्ते!

लखनऊ।[ कुलदीप त्यागी]-समाजवादी पार्टी में विवाद सुलझने का नाम ही नहीं ले रहा है, जिन पिता-पुत्र के रिश्ते बहुत मधुर माने जाते रहे हैं, अब उनके रिश्ते कभी गरम-कभी नरम नजऱ आ रहे है, प्रेम और सम्मान दोनों में पूरा नजऱ आता है, खून का रिश्ता बार-बार दोनों को एक करता भी नजर आता है, लेकिन बार-बार  बनते दिख रहे रिश्ते फिर बिगड़ जाते हैं। सपा के अंदरूनी सूत्र इसके लिए जिन दो लोगों को आज विलेन मान रहे है, उनमें एक अमर सिंह और दूसरे रामगोपाल यादव माने जा रहे हैं।
सपा में रामगोपाल यादव और अमर सिंह की शुरू से ही कभी नहीं बनी। अमर सिंह के पार्टी में आने से पहले मुलायम सिंह यादव हर काम में केवल रामगोपाल यादव पर ही निर्भर रहा करते थे। अमर सिंह आये तो उन्होंने मुलायम के यहाँ अपनी हैसियत इतनी बड़ी कर ली कि पूरे परिवार और पार्टी के खुले विरोध के बाबजूद भी मुलायम ने कभी अमर सिंह को नहीं छोड़ा। विवाद हद से बाहर बढ़ा तो मुलायम को अमर को पार्टी से तो बाहर करना पड़ा, लेकिन उसके बाद भी मुलायम ने बार-बार संकेत दिए कि अमर उनके दिल में है। मुलायम के सगे छोटे भाई शिवपाल यादव की भी कभी चचेरे भाई राम गोपाल से नहीं बनी। इनमें भी नंबर 2 की हैसियत की सदा से ही लडाई रही। मुलायम ने रामगोपाल के सामने कभी भी शिवपाल को ये हैसियत नहीं दी। जब अमर ने आकर रामगोपाल से उनकी नंबर 2 की हैसियत छीनी तो शिवपाल को अंदरूनी खुशी मिली और दुश्मन का दुश्मन, बढिय़ा दोस्त होते है बस इसी वजह से शिवपाल और अमर में खूब दोस्ती बन गयी, जो अब तक लगातार जारी है। शिवपाल अकेले कभी रामगोपाल को मात नहीं दे पाते थे, लेकिन अमर के सहारे उन्हें भी अपने मन की करने की इच्छा पूरी हो जाती थी।
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अमर को पार्टी से निकाले जाने के बाद पार्टी में रामगोपाल फिर नंबर 2 थे, इसलिए शिवपाल फिर खुद को कमजोर मानते थे इसलिए उन्होंने किसी तरह फिर अमर की पार्टी में वापसी करा ली और अमर के आने के बाद वे फिर मुलायम के बाद पार्टी में सबसे ताकतवर नेता बन गए, अमर के सहारे ही सही। मुलायम का अमर प्रेम और पार्टी में फिर शिवपाल की मजबूती, रामगोपाल को कभी बर्दाश्त नहीं हुई और रामगोपाल की अमर व शिवपाल से यही निजी खुंदक आज पिता-पुत्र के रिश्ते बिगाडऩे में सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। रामगोपाल हो या अमर सिंह, दोनों ही आज बहुत धनी राजनेता हैं, दोनों की ये हैसियत मुलायम की वजह से मानी जाती है। मुलायम जब भी सत्ता में आये तो नोएडा एरिया में जो भी कुछ हुआ, वो इन दोनों ने ही किया। जमीन घोटालों में पहले अशोक चतुर्वेदी, नीरा यादव और ए.पी. सिंह जैसे लोग फंसते रहे हो या अब यादव सिंह जैसे, लेकिन उनके कारनामों को कहीं न कहीं इन्ही दोनों राजनेताओं का आशीर्वाद प्राप्त माना जाता रहा है। यहाँ के ज़मीन घोटालों की सीबीआई जांच शुरू भी करती है, लेकिन माना जाता है कि सीबीआई का रिमोट किसी न किसी राजनीतिक शक्ति के हाथ में ही होता है और जो अपने राजनीतिक समीकरण के हिसाब से ऑन-ऑफ़ करती रहती है, उसी हिसाब से सीबीआई की जांच भी तेज और मंद होती रहती है।
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सपा में मुलायम जब रामगोपाल को नंबर दो की हैसियत देते थे, तो रामगोपाल अपने मन की ही करते थे। अमर सिंह के आने के बाद जब भी उनका कद घटता है तो वे फिर नयी रणनीति बनाने लगते है। सपा में मुलायम की हैसियत ऐसी है कि वहां वे ही अकेले वन मैंन आर्मी है। 2012 में उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में जाने का मन बनाया तो अपने लाडले को मुख्यमंत्री की गद्दी सौंप दी। 2012 के चुनाव में पार्टी को बम्पर बहुमत दिलाने में अखिलेश का बड़ा योगदान माना भी जा रहा था। अब जब अमर सिंह की सपा में दोबारा वापसी हुई और रामगोपाल को अपना कद घटता नजऱ आया तो उन्हें याद आया कि अखिलेश को मुख्यमंत्री उन्होंने ही बनवाया था और शिवपाल एंड पार्टी ने तो बहुत विरोध किया था, जबकि अमर के आने से पहले ये रामगोपाल ही थे, जिन्होंने अखिलेश के खास माने जाने वाले युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय लाठर को भी पद से इसलिए बर्खास्त कर दिया था, क्योंकि संजय ने इनके इलाके में बिना इनकी मर्जी के घुसने की हिमाकत की थी।
अखिलेश जब से मुख्यमंत्री बने थे, तभी से नेताजी उन्हें किसी न किसी बात पर सार्वजानिक रूप से डांट दिया करते थे, लेकिन अखिलेश मुस्कुरा कर उनकी डांट स्वीकारते भी रहते थे। अखिलेश को नजदीक से जानने वाले कहते हैं कि अखिलेश तो नेताजी के सामने पडऩे से भी बचते रहते थे, लेकिन अब ऐसा क्या हो गया कि अखिलेश ने उन्हें कुर्सी से हटाकर खुद उस कुर्सी पर कब्ज़ा करने जैसा बड़ा फैसला ले लिया। पहली जनवरी को जब अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था, उस समय भी अखिलेश के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी, बल्कि उन्हें अन्दर से खऱाब भी लग रहा था, पर बताया जाता है कि रामगोपाल ने ही उन्हें ये बताया कि पार्टी बचाने के लिए ये मज़बूरी है।
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सूत्रों के अनुसार अमर दोबारा भी सपा में आये तो उनके रिश्ते अखिलेश से इतने खऱाब नहीं थे, चाचा रामगोपाल ने ही उन्हें याद दिलाया कि ये वो ही अमर सिंह है, जिसने साधना गुप्ता को उनकी माता जी के निधन के बाद सौतेली माँ के रूप में घर में घुसाया था। ये वो ही अमर सिंह और शिवपाल हैं, जो साधना गुप्ता के बेटे और बहु को तुम्हारी कुर्सी पर बिठाना चाहते हैं। तुम्हें कुर्सी से हटाने के लिए जादू-टोने करा रहे हैं। बस उसी के बाद से अखिलेश को भी अमर सिंह ज्यादा बुरे लगने लगे, नहीं तो एक कार्यक्रम में अमर सिंह पीछे की सीट पर बैठे थे, तो अखिलेश ने खुद उन्हें अंकल कहकर संबोधित किया था और मंच से कहकर आगे बैठवाया था। अखिलेश ही नहीं डिम्पल भी इतनी विनम्र हैं कि मुलायम के मित्र के नाते, अंकल के रूप में अमर के पैर छूकर उनका सदा सम्मान करती थी, लेकिन अब रिश्ते इतने खऱाब हो चले है कि अखिलेश, अमर को खुलेआम दलाल तक कहने लगे है , जिन चाचा शिवपाल की पत्नी सरला को वे अपनी माँ की तरह इज्जत देते थे, उन्हें भी मंत्री पद से हटा देते हैं और इनके चक्कर में पिता से भी रिश्ते बिगाड़ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार इन सब के पीछे रामगोपाल को ही मुख्य वजह माना जा रहा है।
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मुलायम और शिवपाल समेत पूरा परिवार मानता है कि अखिलेश बहुत विनम्र हैं, अखिलेश की विनम्रता और पिता के प्रति उनके सम्मान का इससे बड़ा उदहारण क्या हो सकता है कि अखिलेश इस दिवाली से पहले तक भी अपने परिवार के साथ मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में नहीं रहते थे, बल्कि अपने पिता के साथ उनके उसी आवास में रहते थे, जिसमें उनकी सौतेली माँ साधना गुप्ता भी अपने बेटे प्रतीक व बहु अपर्णा के साथ रहती थीं, लेकिन अब ऐसे हालात बन गए कि अखिलेश को मुलायम के घर के ठीक बराबर में दूसरे घर में जाकर रहना पड़ा। माना जा रहा है कि ये हालात बनाने में कहीं न कहीं अमर सिंह कारण है। लोग कहते है कि उनके पैर ही ऐसे हैं कि जिस घर में पड़ते है वहां विवाद खुद ही खड़े हो जाते है और पिता-पुत्र के सम्बन्ध फिर मधुर न हो इसके पीछे रामगोपाल को माना जा रहा है, क्योंकि अब मुलायम के यहाँ रामगोपाल को कभी भी नंबर दो की हैसियत नहीं मिल सकती, इसलिए राम गोपाल भी अब नहीं चाह रहे कि मुलायम की सपा में कोई हैसियत हो। अखिलेश के यहाँ तो उन्हें नंबर 2 की हैसियत हासिल है ही।
 

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