अब युवा किताबें नहीं पढ़ते

अब युवा किताबें नहीं पढ़ते

आज की पीढ़ी पढऩे से विमुख हो रही है। आज की जीवन शैली का यह एक स्वाभाविक परिणाम है और इसके लिए हम उन्हें दोष भी नहीं दे सकते। डिस्टै्रक्शंस आज इतने हैं जैसे पहले कभी न थे। तेज रफ्तार चौंधियाती जीवन शैली के पीछे एक चूहा दौड़ लगी है। जो रूक गया, वो पिछड़ गया। पिछडऩा कोई नहीं चाहता।
युवाओं को अंग्रेजी सस्ते चालू किस्म के उपन्यास लुभा रहे हैं जिनमें रोमांस के नाम पर सिर्फ अश्लीलता भरी होती है, जो ‘एनिमल इंसटिंक्ट्’ को उत्तेजित करती हैं। इन्हें वे काम पर जाते हुए कैब में दो तीन घंटे के ड्राइव के दौरान या मेट्रो में बैठकर पढ़ लिया करते हैं। आज की पीढ़ी में भटकाव है दिशाहीनता है। मानसिक रूप से वे असंतुलित हैं। पहचान को लेकर वे अपना चैन गंवा चुके हैं। बड़े-बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट्स, पॉलिटिशियन्स, ब्यूरोक्रेट्स के अमीरजादे बेटे अमीरजादी बेटियां हमउम्र लोगों को सिर्फ कॉम्पलेक्स और फ्रस्टे्रशन दे रहे हैं।
बढ़ते अपराध, मानसिक बीमारियां और आत्महत्या का बढ़ता ग्राफ यही दर्शाता है कि आज के युवा लड़के-लड़कियां किस जद्दोजहद से गुजर रहे हैं। अच्छा साहित्य सही मार्गदर्शन करता है, मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है, युवा शक्ति को नियंत्रित करता है लेकिन इसके लिए आज फुर्सत किसे है।
अगर कुछ दशक पूर्व की बात करें तो स्थितियां भिन्न थी। टी. वी. के शिकंजे से मुक्त विद्यार्थी साहित्य चर्चा में रस लेते थे। अच्छी किताबों के पॉजिटिव इफेक्ट्स लोगों की साइकी में रच बस जाते थे। ये किताबें उन्हें सोचने पर बाध्य करती थी। कल्पनाओं के पंख देती थी। व्यक्तित्व को सुदृढ़ बना उसे विस्तार देती थी।
दुनिया के अनोखे रीति-रिवाज…!

तकनीकी उन्नति ने जीवनशैली बदलकर रख दी है। इडियट बॉक्स और कंप्यूटर ने युवा वर्ग की रूचि ही बदल कर रख दी है। नेट पर ऑनलाइन बुक्स पढऩे की सुविधा तो जरूर है लेकिन किताबें पश्चिमी रंग में रची बसी हैं।
कुछ गिनती के लोग पढऩे में अगर दिलचस्पी रखते भी हैं तो किताबों का मूल्य इतना ज्यादा है कि उसे खरीद पाना आम आदमी के वश की बात नहीं। बाकी अमीर घरों में किताबें पढऩे के बजाय सजावट के लिए ज्यादा खरीदी जाती हैं।
आज की पीढ़ी का मानना है ‘टाइम इज मनीÓ। अब जबकि पैसा ही भगवान है, पैसा ही माई बाप तो किताबों के साथ समय की बर्बादी करना किसे गवारा होगा। बाजारवाद, ग्लैमर की चकाचौंध, भौतिकवाद की मानसिकता, गला काट प्रतियोगिताएं, दिखावट का जुनून, आई.टी. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सम्मोहन, इन सब के चलते गंभीर साहित्य और ज़मीन से जुड़ी संस्कृति के बारे में सोचने वाले कितने युवक यवतियां मिलेंगे?
त्वचा भी मांगती है आहार

इसमें दो राय नहीं कि बच्चों की आई क्यू और जी. के. इतना बढ़ गया है कि यह चौंकाने वाला है। हर विषय में डिस्टिंक्शन, ए, एक्सीलेंट, आउटस्टैंडिंग प्रूव होना कोई बड़ी बात नहीं रह गई। बच्चों का दिमाग कंप्यूटर बनता जा रहा है लेकिन जहां मानवीय साइड देखें तो गहराई कितनी है, यह देखकर हैरानी होगी।
यह अच्छा साहित्य ही है जो गहराई प्रदान करता है। संवेदनाओं को धार देकर अन्र्तदृष्टि, परखने की समझ प्रदान कर व्यक्तित्व को संपूर्ण बनाने में सहायक बनता है।
– उषा जैन ‘शीरीं’

Share it
Top