अब मान ही लें कि जानवर बन चुका है पुरूष

अब मान ही लें कि जानवर बन चुका है पुरूष

भारत में नारी को पुरातन समय से देवी मां के रूप में पूजा जाता रहा है परन्तु अब ऐसा नहीं है। आज भी हम इस दृष्टि से नारी का सम्मान तो करते हैं परन्तु मात्र पर्वों पर प्रतीकात्मक तौर पर। आज नारी के प्रति पुरूष की मानसिकता जानवर के समान हो गई है। देखा यह गया है कि जहां एकल महिलाओं की संख्या अधिक पाई गई, वहां अकेले रह रही महिलाएं उन समाजों से तुलनात्मक रूप से अधिक स्वीकृत हैं। समाज एक हद तक खुला माहौल दे रहा है जिसमें वे अपने निर्णय के अनुसार अपना जीवन बिताने में सफल हो पाती है।
दूसरी तरफ जहां घरेलू महिलाओं का सवाल है वहां स्पष्ट तौर पर यही कहा जा सकता है कि वहां महिलाओं को निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है तथा उनमें निर्भरता अभी अधिक है, इसलिए वे अकेले गुजर-बसर करने की स्थिति में भी नहीं है। ऐसा नहीं है कि उन परिवारों की स्थिति इतनी अच्छी है कि वे वहां बने रहना चाहती हैं बल्कि उनके सामने विकल्पहीनता की स्थिति है।
दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, सम्पति से बेदखली, डायन, हत्या, यौन हिंसा की घटनाएं बताती हैं कि महिलाएं परिवार के भीतर पीडि़त हैं। क्या एक औरत को इस बात का अंदाजा नहीं रहता होगा कि उसे मारा भी जा सकता है। यदि उसके पास साधन, स्रोत होते और सामाजिक स्वीकृति होती तो वह हिंसा क्यों सहती रहती? अपनी अलग दुनियां क्यों नहीं बसा लेती?
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 एक तरफ तो हम बिगुल बजाते हैं कि हमारे देश में स्त्रियां स्वतंत्र हैं और किस मायने में स्वतंत्र है? स्त्री घर के खर्च में पैसों का जुगाड़ कर घर की आय बढ़ाती है। उसने देश की रक्षा तक का बीड़ा ले लिया परन्तु समाज ने उसे क्या दिया? अगर वह देर रात में घर आए तो उसकी अस्मत लूट ली जाती है और एक अंधेरे मोड़ पर छोड़ दिया जाता है। यदि मौत हो जाए तो हम एक हफ्ते तक कौओं की कांव-कांव कर हादसा समझ भूल जाएं, यदि जीवित बचे तो समाज उसका जीना दूभर कर दे।
हमारे पुरूष समाज की विकृति यह है कि प्राय: हमने देखा है कि वह महिलाओं के लिए लार टपकाते हैं। बाजार में महिलाएं भी जाती हैं, बच्चियां भी जाती हैं तो क्या कभी हमने यह सोचा है कि यह महिला कहीं हमारे परिवार की सदस्य न हो। महिलाओं के पहनावे पर की गई प्रतिक्रिया, रात में बाहर न निकलने की सलाह या फिर कोई वहशी हमला करे तो सरस्वती मंत्र का उच्चारण, वहशी को भाई बोलने की सलाह हमारे पुरूष समाज की विकृत प्रवृत्ति को दर्शाती है।
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आवश्यकता है पुरूषों को अपनी मानसिकता सुधारने की, सख्त कानूनी कदम उठाने की। वाकई आज मनुष्य में डर-भय जैसी चीजें नहीं रह गई है। यदि कानूनविदों ने समय रहते इसे नहीं सुधारा तो जन आंदोलन होगा जिसमें जनता ऐसे अपराधियों को कानून तक पहुंचने नहीं देगी और स्वयं ही सजा देगी। जिस आतंकवाद और नक्सलवाद को हम दूर भगाना चाह रहे हैं, डर है कि वह कहीं दूसरे रूप में घर-घर में न आ जाएं।
– राजीव अग्रवाल

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