अब गुजरात व हिमाचल में सक्रिय होंगे दल

अब गुजरात व हिमाचल में सक्रिय होंगे दल

हाल ही में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद अब इस वर्ष के अंत में गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में राजनीतिक दल व राजनेता अब पूर्ण मनोयोग से इन दो राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी जुटेंगे। चुनाव के बाद सत्ता किसे मिलेगी तथा किसे निराशा हाथ लगेगी, यह तो लोकतंत्र के भाग्य विधाता अर्थात् मतदाता ही तय करेंगे क्यों कि उनका वोट ही राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों का भविष्य तय करता है। इस दिशा में राजनीतिक दलों की सक्रियता अभी से बढ़ गई है। गुजरात में भारतीय जनता पार्टी पिछले 19 साल से सत्ता में है जबकि कांग्रेस राज्य विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी है। गुजरात चुनावों के लिए इस बार कांग्रेस पार्टी द्वारा खास रणनीति तय की जा रही है ताकि पार्टी का सत्ता से वनवास खत्म कराया जा सके। वहीं राज्य में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी राज्य के चुनाव में फिर अपनी विजय सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश करेगी। कांग्रेस को गुजरात में सत्ता विरोधी लहर से काफी उम्मीद है क्यों कि राज्य में हालात इस बार थोड़ा बदले हुए हैं। राज्य के पटेल समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर गत वर्ष आंदोलन किया गया था। इस आंदोलन से राज्य का जनजीवन बाधित हुआ लेकिन सरकार द्वारा आंदोलनकारियों की मांग नहीं मानी गई।
अब राज्य के विधानसभा चुनाव में इस समुदाय का क्या रुख रहेगा तथा इससे भाजपा को कितना नुकसान होगा, यह सब चुनाव संपन्न होने और परिणाम घोषित होने के बाद ही पता चल पायेगा। लेकिन राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस माहौल का फायदा उठाने की पूरी कोशिश करेगी। पार्टी द्वारा इस दिशा में चुनावी जमावट भी प्रारंभ कर दी गई है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस राज्य के विधानसभा चुनाव में किसी नेता को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करती है या नहीं।
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 राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शंकर सिंह बाघेला प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं तथा वह अपनी वरिष्ठता एवं सुदीर्घ राजनीतिक अनुभव के आधार पर मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं। वहीं दूसरी ओर राज्य के अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेता भी हैं जो कांग्रेस के राज्य का विधानसभा चुनाव जीतने पर मुख्यमंत्री बनना चाहेंगे। ऐसे में कांग्रेस के लिये सबसे पहले आवश्यक यह होगा कि वह पहले राज्य के चुनाव में जीत हासिल करे। क्यों कि मुख्यमंत्री का फैसला तो चुनाव संपन्न होने के बाद भी कर लिया जायेगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शंकर सिंह बाघेला का कहना है कि वह राज्य के विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की सेवाएं लेना चाहते हैं। ऐसे में पीके कांग्रेस के लिये कितने फायदेमंद साबित होंगे, यह देखने की बात होगी। क्यों कि यूपी के विधानसभा चुनाव में पीके कोई करिश्मा नहीं कर पाये। वहीं गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा काफी आशान्वित व उत्साहित नजर आ रही है। खासकर यूपी की सत्ता हासिल होने के बाद उसके हौसले बुलंद हैं। राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने आठ माह पूर्व ही राज्य की कमान संभाली है। भाजपा को राज्य में नेतृत्व परिवर्तन पटेल आरक्षण आंदोलन के बाद करना पड़ा था। राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल हालात से निपटने में पूरी तरह विफल साबित हुई थीं। अब जबकि भाजपा राज्य विधानसभा का चुनाव जीतने की तैयारी में जुटी हुई है, तो उसकी नजर में अपनी सकारात्मकता व उम्मीदें भी हैं तो चुनौतियों का सामना भी करना पड़ेगा।
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अभी कुछ दिन पूर्व ही गुजरात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी ने कहा था कि राज्य विधानसभा मार्च के अंत तक भंग हो सकती है लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि राज्य के विधानसभा चुनाव अपने निर्धारित समय पर नवंबर-दिसंबर में ही संपन्न होंगे। गुजरात विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के भी भाग लेने की संभावना है क्यों कि पार्टी इसकी तैयारी काफी पहले से करती आई है। अभी पंजाब और गोवा के चुनाव नतीजों से आप के हौसले कुछ कमजोर हुए हैं। पार्टी को पंजाब में सिर्फ 20 सीटें ही मिल सकीं जबकि गोवा में उसका खाता भी नहीं खुल पाया। गुजरात की भांति हिमाचल प्रदेश के चुनाव भी काफी रोचक होने वाले हैं। राज्य में मौजूदा समय में कांग्रेस की सरकार है तथा उसे उम्मीद है कि वह राज्य के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में दोबारा जीत हासिल करेगी। हिमाचल की वीरभद्र सरकार अपनी उपलब्धियों व नेक कामों के आधार पर राज्य के मतदाताओं से फिर सत्ता का जनादेश प्राप्त करने की कोशिश करेगी। वहीं दूसरी ओर राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा भी इस बार राज्य के विधानसभा चुनाव में जीत का दावा कर रही है।-सुधांशु द्विवेदी

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