अपने अधिकारों से आज भी वंचित हैं महिलाएं

अपने अधिकारों से आज भी वंचित हैं महिलाएं

आजकल महिला कल्याण की बातें सर्वत्र पढऩे व सुनने को मिलती हैं, लेकिन फिर भी महिलाओं के विकास, कल्याण व सुरक्षा के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह ही लगा रहता है। स्त्री-पुरूष समानता को लेकर न केवल पश्चिमी देशों में अपितु भारत में भी तमाम संगठनों के बीच बहस छिड़ी रहती है। नारी स्वतन्त्रता के नाम पर आज भी स्त्री को अकेलापन, मायूसी, भटकाव व उत्पीडऩ ही मिला हुआ है। यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि भारतीय समाज में पुरूष की तुलना में नारी कहीं उत्पीडि़त, उपेक्षित, कमजोर व असहाय नजर आती है।
वर्तमान परिपेक्ष्य में यदि गहराई से मूल्यांकन किया जाए तो नारी के अधिकारों व शोषण से मुक्ति की बातें अब पूरी तरह से बेमानी सी लगती हैं। पुरूष पर नारी की निर्भरता तथा उसके साथ किए जा रहे असामान्य व्यवहार से सब भलीभांति परिचित हैं, फिर भी स्त्री पुरूष के कठोर व्यवहार को निरन्तर सहन कर रही है।
नारी उत्पीडऩ किसी वर्ग में नहीं है बल्कि हर समाज में जी रही स्त्री की यही कहानी है। नारी उत्पीडऩ के पीछे उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के लोग कहीं ज्यादा जिम्मेदार हैं जिन्होंने अपनी हर इच्छापूर्ति के लिए न केवल उसे वासना का शिकार बनाया बल्कि उसके दैहिक शोषण का क्रम भी जारी रखा। पुरूषों की सत्ता ने जहां नारी की महत्ता को भुलाने की कुचेष्टा की है, वही नारी भी उनके दबाव में अपना विवेक खोकर उनके हाथ की कठपुतली बनती चली गयी। दुनिया भर के तमाम देशों में पनपी स्त्री शक्ति का नुकसान दिन प्रतिदिन होता चला गया, लेकिन किसी भी संगठन ने ईमानदारी से इनमें सुधार करने का प्रयास नहीं किया।
नारी को सदैव भोग-विलास की वस्तु समझकर उसके जीवन से सदियों से खिलवाड़ होता आ रहा है। भले ही दिखावे के तौर पर संसद में, यहां तक कि महिला संगठनों में इस बात का ढिंढोरा पीटा जाता रहा कि महिलाओं को अपने हितों व हकों को पाने के लिए आगे आकर संघर्ष करना चाहिए लेकिन सच तो यह है कि बेईमानी के उजास में नारियों पर होने वाले शोषण व दमन तथा बढ़ रहे अत्याचारों की अनदेखी ही की जा रही है। यह तय है कि पुरूष ने स्त्री के अस्तित्व को मानव के रूप में न देखकर यौन प्रतीक से ज्यादा कुछ भी तो नहीं माना है।
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सृष्टि निर्मात्री के रूप में स्वीकारी गयी नारी को संघर्ष का रूप माना गया है, जिसने जीवन के कठोर पथ पर जब से कदम रखा है, अमानवीय यातनाएं ही सहन की हैं। भारतीय सभ्यता व संस्कृति में नारी को सम्मान देने की गौरवशाली परम्परा रही है, किन्तु खेद का विषय है कि ये परम्पराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। प्रकृति ने नारी को भले ही विरासत में भावुकता दी है लेकिन आत्म सम्मान के साथ जीने का शायद हक नहीं दिया है, इसीलिए आज नारी ही नारी की सबसे बड़ी शत्रु बन कर उभर रही है।
जहां तक महिलाओं के दैहिक शोषण व उन पर अत्याचार का सवाल है तो निश्चय ही स्त्रियां भी इसमें कम दोषी नहीं हैं, क्योंकि आजकल जिस तरह की भोंडी संस्कृति विकसित हुई है, उसमें नारी ने चन्द पैसों के लालच में अपने को वस्त्रविहीन करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसी वजह से उनके साथ उत्पीडऩ की दर्दनाक घटनाएं भी घट रही हैं। सबसे खेदजनक स्थिति उन छोटी उम्र की लड़कियों की है जिनको समाज ने वेश्यावृत्ति के नरक में ढकेलकर, सारी जिन्दगी इस गन्दगी में काटने के लिए छोड़ दिया। सवाल यह भी है कि इस नारकीय भटृटी से निकली अबलाओं को हमारा सभ्य समाज अपनाने में भी संकोच करता है, तब भला वे किस समाज में इज्जत से जीने का हक मांगें?
करोड़ों की आबादी में अभिशप्त जिन्दगी जीने को मजबूर नारियां अपने हक में आवाज बुलन्द करने में इसलिए कतरा रही हैं कि आखिर उनकी पुकार सुनने वाला है कौन? हालांकि नारी मन की विवशता ने उन्हें कमजोर अवश्य बनाया है, पर सवाल यह उठता है कि आखिर यह स्थिति कब तक बनी रहेगी? आखिर कब तक वे दया की पात्र बनी रहेंगी?
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महिलाओं के विकास व उनके शोषण की जड़ में जो समस्याएं हैं, उन पर सीधे तौर पर किसी की भी नजर नहीं पड़ती। हमारे देश में स्त्रियों का विशाल हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में है लेकिन शहरी चकाचौंध व पश्चिमी नकल की तर्ज पर चलने वाली महिलाएं शायद इन्हें अपनी जमात का हिस्सा स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। यूं भी कानूनों की जटिलता, देरी से मिलने वाली न्याय की प्रक्रि या भी इनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में बाधक है। महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई में कूदे विभिन्न सामाजिक संगठनों की भूमिका भी कोई सशक्त नहीं है क्योंकि ये संगठन स्वयं ही दिन-ब-दिन कमजोर पड़ते जा रहे हैं, जिससे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में महिलाओं पर अत्याचार बढ़ ही रहे हैं। समाज की अधिकांश पीडि़त महिलाओं का एक मत यह भी उजागर हुआ है कि महिलाओं पर केवल पुरूषों द्वारा ही जोर-जबरदस्ती नहीं की जाती बल्कि स्वयं महिलाएं भी जिम्मेदार हैं। हमने यह भी माना है कि देश ने हर क्षेत्र में प्रगति की है लेकिन हम आज भी हीन भावना से ग्रस्त हैं। समाज में नित्य परिवर्तन हो रहे हैं लेकिन स्त्री की दशा में कोई बदलाव न आना निश्चय ही दर्दनाक व शर्मनाक है। यदि सचमुच, हमें नारी कल्याण व उनके अधिकारों व समुचित विकास के लिए पग उठाना है तो नारी के मन में बैठी कुंठा व उसकी विवशता को दूर करना होगा। वक्त की जहां पुकार है, वहीं समाज की भी मांग है कि स्त्रियां आगे आयें। इसके लिए इन्हें एक लंबे संघर्ष की लड़ाई कंधे से कंधा मिलाकर लडऩी होगी, फिर कार्यक्षेत्र कैसा भी क्यों न हो।
आवश्यकता तो इस बात की है कि पुरूषों को नारियों के प्रति अपना सोच बदलना होगा लेकिन इस सोच के पीछे पूरी ईमानदारी बरतनी होगी ताकि इनके प्रति सोचा गया व उठाया गया हर कदम प्रभावशाली हो सके।
-चेतन चौहान

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