अन्नदाता पर पड़ी तिहरी मार…फसलों की बुआई, गन्ना भुगतान व नोटबंदी ने ढहाया सितम

अन्नदाता पर पड़ी तिहरी मार…फसलों की बुआई, गन्ना भुगतान व नोटबंदी ने ढहाया सितम

kisan‘सत्येन्द्र सिंह उज्जवल’
मुजफ्फरनगर। हमारा देश कृषि प्रधान देश है। जिसके चलते खेती करने वाले किसान को अन्नदाता कह कर पुकारा जाता है। इस साल अन्नदाता का भाग्य उससे रूठा हुआ प्रतीत हो रहा है। वह उसका किसी भी प्रकार से साथ नहीं दे पा रहा है। उसकी मुसीबतें कम होने के बजाय अधिक होती जा रही हैं। वैसे ही अन्नदाता को उसकी गन्ने की फसल का पैसा पूरा अभी नहीं मिला है। जिस कारण वह इस समय आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका है। अब रही सही कसर प्राकृतिक आपदा रूपी दिन-प्रतिदिन पड़ रहे घने कोहरे ने पूरी कर दी है। उसकी मुसीबतें यहीं नहीं थमीं, नोटबंदी ने तो उसके लिए कोढ़ में खाज का काम कर दिया है। पैसों की तंगी के चलते वह अपने किसी भी कार्य को अंजाम नहीं दे पा रहा है। न तो वह गेहूं की बुआई कर पा रहा है और न ही शादी आदि के कार्य। वह पूर्ण रूप से बर्बादी की कगार पर जा पहुंचा है।
वर्तमान समय में गेहूं की बुआई का समय चल रहा है। पैसे की कमी के चलते अन्नदाता गेहूं का बीज नहीं खरीद पाने के चलते इसकी बुआई नहीं कर पा रहा है। जिस किसी ने गेहूं की बुआई की तैयारी भी की, उस पर पड़ रहे घने कोहरे ने पानी पफेर दिया है। उसके द्वारा की जाने वाली सब्जियों की खेती के भी बाजार में नोटबंदी के कारण सही दाम नहीं मिल पा रहे हैं। वह उसे कोड़ियों के भाव बेचने को मजबूर है। जिसके कारण अन्नदाता की कमर पूरी तरह से टूट चुकी है। इससे तो वह शायद शीघ्र उभर भी नहीं पाएगा।
अन्नदाता आसमां की ओर अपने दोनों हाथ उठा कर उफर वाले अर्थात भगवान से यही सवाल कर रहा है कि आखिर उसका कसूर क्या है, क्या उसने अन्नदाता बन कर किसी प्रकार का गुनाह कर दिया है। जवाब न मिलने पर वह अपनी बेबसी पर आंसू बहा कर रहा जाता है।
घने कोहरे की मार सबसे अधिक सब्जियों की खेती करने वाले अन्नदाता पर पड़ रही है। कोहरे के चलते उसकीं आलू की फसल बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। वहीं नोटबंदी ने उसकी सब्जियों के दाम भी बाजार में धरातल पर लाकर उसे बर्बादी की ओर दिया है।
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पेशे से किसान सिसौली निवासी विकास बालियान व दूधहेड़ी निवासी मनोज राठी का संयुक्त रूप से कहना था कि वैसे तो किसान की आमदनी का जरिया गन्ने व गेहूं की फसलें ही हैं। कुछ किसान सब्जी की खेती भी करते हैं। गन्ने का पूरा दाम अभी तक नहीं मिल सका है। उफर से नोटबंदी ने तो किसान के उफर कुठाराघात करते हुए उसे उफर से लेकर नीचे तक हिला कर रख दिया है। पैसें की तंगी के चलते वह गेहूं के बीज की खरीद तक नहीं कर पा रहा है। यदि किसी के पास बीज है, तो वह घने कोहरे के चलते उसे बो नहीं पा रहा है, क्योंकि घना कोहरा बुआई के लिए खेत को तैयार करने में बाध्क बन रहा है। नोटबंदी के दौर में किसान अपने घरेलू कार्य भी नहीं कर पा रहा है, जैसे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई व उनकी शादी आदि। घने कोहरे ने उसकी आलू की फसल को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। घना कोहरा आलू की फसल के लिए जहर के समान होता है, दोनों मे छत्तीस का आंकड़ा बताया जाता है।
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यह आलू का जानीदुश्मन होता है। इससे खेत को बचाने के लिए सही मात्रा में पानी की सिंचाई सहित खेत के चारों ओर धए कर काफी हद तक इसकी रोकथाम की जा सकती है। मनोज राठी का कहना था कि जिन किसानों को बाजार में अपनी सब्जियों के अच्छे दाम मिल रहे थे, नोटबंदी के उपरांत लोगों के पास पैसों की कमी के चलते उनके द्वारा सब्जियों की खरीदारी नहीं हो पा रही है। जिस कारण से किसान अपनी सब्जियों को बाजार में कोड़ियों के भाव दे रहे हैं। उनका मंडी तक लाने का भाड़ा भी नहीं निकल पा रहा है,जिसके चलते उनकी फसलें अब खेतों में सड़ रही हैं। किसानों को आसमानी आफत रूपी कोहरे व नोटबंदी के चलते जो हानि उठानी पड़ रही है, उसकी भरपाई तो वर्तमान समय में संभव सी प्रतीत हो रही है। कुल मिला कर सार यही है कि अन्नदाता के लिए तो एक तरफ कुंए व एक तरफ खाई है। वह गन्ने, गेहूं व सब्जियों की खेती करे तो मरा और न करे तो भी मरा।
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