अन्नदाता तेरी यही कहानी

अन्नदाता तेरी यही कहानी

मैं प्रधानमंत्री जी को इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने किसानों को एक नया नाम दिया है अन्नदाता। आज सवाल उठ रहे हैं कि आज तक किसान आत्महत्या क्यों करते आ रहे हैं। सारी चीजें, सारी घोषणाएँ न जाने क्या-क्या सरकारें किसानों के लिए करती रहती हैं, फिर भी किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? सवाल यह उठता है कि आखिर अब-तक की सरकारों ने क्या किया जो किसान कर्ज से लुटता गया, कर्जदार होते गया। जो दिन रात एक करके सबको अन्न, पेट भरने को देता है उसकी दयनीय दशा का जिम्मेदार आखिर कौन है?
दिन-रात, गर्मी-बरसात, धूप-छाँव और अनेकों समस्याओं से जूझता किसान अन्न उगाता है लेकिन अफसोस और ताज्जुब की बात है कि ये अन्नदाता बिचौलिये और राजनीति से मुक्त नहीं हो पाते हैं। सोचिए जरा कि अन्नदाता की समस्या कभी राजनीति से मुक्त हो सकती है क्या? कहने को सभी राजनीतिक पार्टियां पल भर में अन्नदाता की समस्याओं को दूर करनें की सपने दिखाती हैं मगर सच क्या है, इससे ऐसा कोई नहीं है जो परिचित न हो।
ये जातीय संघर्ष ठीक नहीं
आज किसानों को एक नाम मिला है अन्नदाता। सच में बड़ा गर्व होता है यह शब्द सुनकर लेकिन बड़ा दुख होता अन्नदाता की परेशानियों से दो-चार होकर। समझ में नहीं आता कि जो बिना स्वार्थ के इतना बड़ा त्याग करता है उसके साथ इतना बड़ा छल, झूठ, कपट और मक्कारी क्यों की जा रही है। माना कि अन्नदाता होना एक कसूर है लेकिन इस कसूर की इतनी बड़ी सजा मत दीजिए?आखिर इनका कसूर इतनी बड़ी सजा के लायक नहीं हो सकता?
सोचिए जरा कि जो अन्नदाता दूसरे के पेट की आग, भूख को मिटाने का काम करता है उसको अपनी पैदावार बेचने के लिए एड़ी-चोटी का दम लगाना पड़ता है, बिचौलियों के हाथ की कठपुतली बननी पड़ता है। क्या इसे कलंक नहीं कहा जा सकता है कि इस आधुनिक युग में अन्नदाता आत्महत्या करे। आदमी भूख से मर जाय तो बात समझ में आती है लेकिन भूख मिटाने वाला ही मरने लगे,आत्महत्या करने लगे तो क्या कहां जा सकता है?
कहने में संकोच न करें…ज़रूर कहें अपने दिल की बात…!
राजनीति का शिकार अन्नदाता यह सोचता है कि जो होगा भला होगा। क्योंकि वो राजनीति का कहकरा नहीं पढ़ा है, इसलिए वो इनके मायाजाल में फँस जाता है। इन लोगों को यह बात कब समझ में आयेगी कि इंसाफ हमेशा सही होता है। यह अलग बात है कि हताशा और सिस्टम का शिकार अन्नदाता हार कर आत्महत्या को मजबूर हो जा रहा है। कर्जदार अन्नदाता आज इतना जलील होता जा रहा कि कहा नहीं जा सकता? कभी मौसम की मार, कभी प्रकृति की बेरूखी से तंग अन्नदाता आज इतना त्रस्त हो गया है कि उसे कोई और रास्ता नहीं दिख रहा है? आज अनेकों योजनाएँ अन्नदाताओं के लिए लायी गई है पर सब जटिल और दुरूह हैं।
दफ्तर का चक्कर काटते-काटते ये ऊब जाते हैं और योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते हैं। जैसे बैंक वाले किसान क्र ेडिट कार्ड के लिए दौड़ाते हैं और कमीशन माँगते हैं, नहीं देने पर पात्र घोषित नहीं करते हैं और परेशान करते हैं जिससे दिल टूट जाता है अन्नदाता का और यह थक हार के बैठ जाता है। फसल बीमा योजना का भी लाभ सभी अन्नदाता नहीं उठा पाते हैं। कई दिक्कतों, समस्याओं से जूझता अन्नदाता अगर आज आत्महत्या करता है तो इससे शर्म की और मुँह पर कालिख पोतने वाली कोई और बात हो ही नहीं सकती।
– विनय कुमार मिश्र

Share it
Share it
Share it
Top