अनूठी है जोधपुर राजघराने की दीपावली परम्परा

अनूठी है जोधपुर राजघराने की दीपावली परम्परा

jodhpurमारवाड़ में यूं तो अनेक तीज त्यौहार समय-समय पर परम्परागत तरीके से मनाए जाते हैं, लेकिन दीपावली का त्यौहार जोधपुर का राजघराना परिवार (जो सूर्यवंशी कहलाता है,) परम्परा से थोड़ा अलग हटकर मनाता है। इसमें राजसी ठाठ-बाट व परम्पराओं के साथ-साथ कुल की मर्यादा, तथा कायदों का विशेष ध्यान रखा जाता है। जोधपुर दुर्ग में दशहरा व दीपावली पर मुख्य रूप से महाराजा अपने सगे भाई बंधुओं व सियासतदानों के साथ मिलकर दीपोत्सव मनाते हैं।दीपावली से पूर्व धनतेरस, रूप चौदस,  की रातों को तेल के दीपक जलाये जाते हैं। यह दीपक किले के प्रमुख द्वार, मंदिर, चौक तथा राजशाला, घुडसाल, धान के कोठार व पूजा स्थलों पर जलाये जाते हैं। कुछ बड़े दीपक राठौड़ों की कुलदेवी नागणेच्या माता, इष्ट चामुण्डा देवी, लोहा पोल, सती हस्त, चिडिय़ानाथ जी, जयपोल, फतेहपोल, राव जोधा का फलसा, दौलतखाना चौक एवं चोखेलाव पर जलाये जाते हैं।दीपावली से पूर्व जहां-जहां दिये जलाने की परम्परा है, वहां चौक ‘पूरने’ का भी रिवाज है। यहां पर समस्त चौकों में मुख्य रूप से जनाना डयोढ़ी श्रृंगार चौकी, डेढ़ कंगूरा पोल, इमरती पोल के बीच लाल गेरु चूने के आकर्षक मांडणे  विवाहिता एवं कुंआरी लड़कियों से ही बनावाये जाते हैं।राजदरबार में रियासतकाल के दौरान दीयों का तेल नियमानुसार कोठार से ही मिलता था। पटरानी के महल में दीवाली के दीयों के तेल अन्य रानियों से कहीं ज्यादा मिलता था। अन्य रानियों को पटरानी से आधा तेल मिलता था। जनानी ड्योढी में रहने वाली राजकुमारियों को राजघराने के कायदे के अनुरूप तेल उपलब्ध होता था। एक और जहां दीपावली पर मंगलगीत घर-घर गाये जाते हैं लेकिन यह जानकर सभी को आश्चर्य होता है कि राजघराने में दीपावली के अवसर पर कोई गीत नहीं गाया जाता जबकि जनाना दरबार के समय ढोलनियां जनानी ड्योढी पर मांगलिक गीत अवश्य गाती हैं।इस अवसर पर महारानी, राजमाता एवं राजदादी के पगे लगाने (चरण-छूने) का दस्तूर करती थी। उस वक्त महारानियां जनानी ड्योढी की अनेक बुजुर्ग औरतों जिसमें बडारणै, पड़दायतों पासवानों, गुरुआणों, रावराणी, धुडला वलीया, धकिया, बुजुर्ग ढोलठा (बूढ़ी ढोल बजाने वाली) और यहां तक कि मेहतरानियों को भी सम्मान देने हेतु ‘पगे लागणों (ओढऩी का पल्ला हाथ में लेकर बैठकर पगे लगने की परम्परा) कराती थी। वे सभी महारानी का वारणा लेती थी।
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जनाना महलों की अन्य रानियां भी इसी प्रकार पगे लगाने की परम्परा का निर्वाह करती थी। राजकुमारियां रजमाथड़ों अरज करती थी एवं इसके बदले में मोहरें (सोने-चांदी की) तथा रोकड़ा दस्तूर लेती थी। महाराजा एवं महारानी को भी अन्य राजपरिवार की स्त्रियां पगे लागणों, के साथ नजर-न्यौछावर करती थी।राज परिवार, लक्ष्मी पूजन हेतु तिजोरी के पास एक बाजोट रखकर लाल वस्त्र बिछाते थे व राजज्योतिषी के मुहूर्त के अनसार थाल में कूटे कागज की हटड़ी रख उसमें फूलियां, चना व चांदी का सिक्का रखा जाता था। ये हटडिय़ा ताजियों के जैसी होती थी। कुछ माटी की हटडिया जो कुम्हारिन लाती थी, वे भी रखी जाती थी।ये हटडिय़ां संख्या में उतनी होती थी जितने राजपरिवार में  पुरुष सदस्य होते थे। सारी हटडिय़ां भर कर उसे कुमकुम व मोली बांध कर पूजा की जाती थी। थाल में लक्ष्मी जी को भोग लगाने हेतु उसमें तरह-तरह के मिष्ठान, चावल, सुपारी, इलायची आदि होते थे। गाय के कच्चे दूध से लक्ष्मी जी को छींटा दिया जाता। पूरी रात अखण्ड ज्योति जलती है। इस दिन कांसे की बड़ी थाली बजाकर लक्ष्मी जी का आह्वान किया जाता है।दीपावली की रात महाराजा एवं महारानी हीड़-सीचन भी करते है। इसके लिए वे गन्ने के ऊपर एक भाग पर शुद्ध मलमल का वस्त्र बांधते हैं व महारानी उस पर तेल डालती हैं। वह मशाल की भांति जलता है और उसका तेल नीचे बर्तन में जब टपकता है तो राजपरिवार यह विश्वास करता है कि आने वाले समय में रोग व शोकमुक्त रहेंगे।दीपावली की रात महारानी व अन्य राजपरिवार की स्त्रियां विशेष तौर पर श्रृंगार करती है वे काजलिया कोट तुर्रियों की पोशाक धारण करती हैं तो गहनों मेंं तीमणियां, राखड़ी तथा नथ पहनती हैं। इस दिन महाराजा अपने समस्त भाई-बंधुओं व सियासतदानों के साथी पाती (पंक्ति) में बैठकर जीमण (खाना) करते हैं। जिसमें लापसी व तरह-तरह की सब्जियां होती हैं।
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 राज परिवार के जमाने में बुजुर्ग लोग कुछ बातों को शकुन से जोड़कर चलते थे। होनी व अनहोनी बातों को भविष्यवाणी के रूप में लेते थे। यदि बच्चा आग जलाने की कोशिश करता था और यदि वह नहीं जलती थी तो माना जाता था कि महामारी फैलेगी व अकाल पड़ेगा। खेलते बालक दुखी हो तो राजा को चिंता सतायेगी, बालक लड़ पड़े तो राजयुद्ध होगा, बच्चों का रोना राज्यनाश का संकेत माना जाता था। बच्चों द्वारा इन्द्रियों को स्पर्श करना व्यभिचार बढऩे का  सूचक माना जाता था।हालांकि राज-रजवाड़ों के दिन अब भले ही लद चुके हैं लेकिन फिर भी मारवाड़ के राजघरानों में यह परम्पराएं आज भी मौजूद है। हां थोड़ा बहुत परिवर्तन अवश्य आया है, लेकिन फिर भी मान-सम्मान व अपनत्व में कमी नहीं आयी है। (विनायक फीचर्स) आप ये ख़बरें और ज्यादा पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल unnamed
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