अनमोल वचन

अनमोल वचन

संसार में जितने भी संत मनीषी हुए हैं, उन्होंने सदा दूसरों के सुख और परोपकार के लिये प्रयत्न किये हैं। वे उस मां के समान हैं, जो सबको पुत्रवत मानती है और सबको खिला पिलाकर स्वयं खाती-पीती है। सबको सुलाकर स्वयं सोती है। उसके सामने ‘पर’ का महत्व होता है, ‘स्व’ का नहीं, यही वह तत्व है, जिसके कारण वह स्वयं गीले में सोती है और सन्तान को सूखे में सुलाती है। मां स्वयं कष्ट सहन करके भी अपनी सन्तान को सुख-सुविधा पहुंचाने के लिये लालायित रहती है। यदि जीवन को ऊंचाई पर ले जाना है तो नींव उतनी ही गहरी और मजबूत होनी चाहिए। भवन उसी आधार पर ऊंचा और मजबूत बनेगा। ‘सब सुखी हो’ की आदर्श स्थिति स्थापित करने के लिये एक साथ अनेक अच्छाईयों का अभ्यास करना चाहिए। ऐसी साधना और जीवन मूल्यों की श्रेष्ठता से जुडकर ही हमारा व्यक्तित्व आदर्श बनता है। मन में नि:स्वार्थ सेवा भाव हो, अपने आसपास के लोगों के प्रति सहानुभूति और स्नेहभरा व्यवहार हो, इसकी सबको आज के समय में सबसे अधिक आवश्यकता है, पैसा तो बाद की बात है। प्यार के दो बोल बोलने और अच्छे व्यवहार के लिये धन की आवश्यकता कहां होती है, आज हमारे जीवन से खुशियां दूर चली गई हैं। इनमें से हर व्यक्ति प्यार और अपनत्व के दो बोल सुनने की अपेक्षा करता है। थोडा सा किसी के साथ प्यार से पेश आकर तो देखें, वह भी आपसे दोगुने प्यार से पेश आयेगा।

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