अनमोल वचन

अनमोल वचन

दूसरों से कुछ पाने में ही सुख नहीं है, देने में भी है। किसी भूखे को खाना खिलाकर अथवा किसी असहाय की सहायता करके जो आनन्द आपको मिलता है, वह शब्दातीत है। उसके आशीर्वाद से आपका आत्मिक बल बढता है, वह क्या कम पुरस्कार है। मैं भी दूसरों को सुखी बना सकता हूं, मेरे सहयोग की किसी को आवश्यकता है, अपेक्षा है यह भरोसा आत्मविश्वास पैदा करता है। जो इन्सान अपने स्वार्थों को भूलकर दूसरों के लिये जीता है, उसको दुख नहीं व्यापता। अधिकांश माताएं अपने बच्चों के लिये बडे से बडा दुख सहने को तैयार रहती हैं। उन्हें खाने-पीने या आराम की परवाह नहीं रहती, इसलिए माता का दर्जा पिता से अधिक माना गया है। दुखों को जीतने के लिये हमें दुर्बलताओं को जीतना होगा और अपने गुणों को विकसित करना होगा। स्वार्थ, मोह, ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष आदि से ऊपर उठकर ही मनुष्य दुख के शिकंजे से छुटकारा पा सकता है। धन्य वे हैं, जिनके मन में अपने को कष्ट देने वाले के भी किसी अशुभ की कामना अपना स्थान नहीं बना पाती। वास्तव में सच्चे अर्थों में ऐसे इन्सान ही सुख के अधिकार होते हैं।

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