अनमोल वचन

अनमोल वचन

श्रीमद् भागवत गीता में एक श्लोक में कहा है कि ‘देहिनो मिन्यथा देहं, कौमारम्, यौवनम् जरा अर्थात इस शरीर की कौमार्य, यौवन एवं वृद्धापन ये तीनों अवस्थाएं स्वाभाविक एवं अनिवार्य हैं। जिसने भी शरीर धारण किया है, उसका बचपना, यौवन तथा वाद्र्धक्य सुनिश्चित है। इसलिए वृद्धावस्था को भार नहीं मानना चाहिए। वैसे तो बार-बार शरीर को धारण करना ही भार स्वरूप है। वृद्धावस्था के प्रति उपेक्षा, अवमानना एवं घृणा का भाव हमारी संस्कृति में नहीं, पाश्विक सभ्यता में ही सम्भव हो सकता है। वृद्धों के साथ उपेक्षा एवं अपमान भरा व्यवहार करने वालों को प्रारम्भिक दिनों में ऐसा करना प्रिय लग सकता है, परन्तु वें भी इसका दुष्परिणाम भुगतते हैं, इसलिए वृद्धजनों के प्रति तिरस्कार का भाव पालने की मूर्खता करने से बचना चाहिए अन्यथा परिवार संस्था को नष्ट होने से कोई बचा नहीं सकता। हम सभी को यह समझना चाहिए कि वृद्धजन निरूपयोगी नहीं होते। उनके लम्बे जीवन के अनुभव परिवार के लिये बहुत उपयोगी होते हैं। उनकी उपेक्षा को अर्थ है कि अपने परिवार को उन वृद्धजनों के व्यवहारिक जीवनोपयोगी विविध ज्ञान एवं अनुभवों से वंचित करना।

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