अनमोल वचन

अनमोल वचन

सम्पन्नता सभी चाहते हैं, सम्पन्नता होना अच्छा है। इसमें कोई बुराई नहीं, परन्तु सम्पन्नता का नशा बुरा है। निर्बल व्यक्ति की सभी उपेक्षा करते हैं, इसलिए शरीर को बलवान और पुष्ट बनाना चाहिए, परन्तु अपनी ताकत पर घमंड करना बुरा है। अनपढ रहना पाप है, विद्या सभी को अर्जित करनी चाहिए। ज्ञानी बनें, विद्वान बनें, परन्तु स्वयं को विद्वान बनने का दम्भ पालना अच्छा नहीं। व्यापार में आगे बढें, प्रतिष्ठा प्राप्त करें, नाम कमायें, अच्छा पढ लिखकर अच्छा पद प्राप्त करें। कितने भी ऊंचे पद पर पहुंच जायें, कितने भी प्रसिद्ध उद्योगपति बन जायें, परन्तु अहंकार छू न जाये, क्योंकि अहंकारी होना बुरा है। अन्न व्यक्ति को पुष्ट करता है, परन्तु यदि वह हजम न हो तो रूग्ण कर देता है। चावल, जौ, गुड आदि सभी पदार्थ श्रेष्ठ हैं, इनकी हवन यज्ञ में हवि भी दी जाती है, परन्तु जब इन्हें सडाकर शराब बनाई जाती है तो वह अहितकर और अवांछनीय बन जाते हैं। आदमी उसका उपयोग करता है, तो उसे नशा हो जाता है। वह असामान्य और कभी-कभी असहनीय व्यवहार करने लगता है। नशा धन का हो, बल का हो, विद्या का हो, पद का हो, वह भी शराब के नशे की भांति हेय दृष्टि से देखा जाता है। धन, बल, पद, विद्या ये सभी प्रभु प्रदत्त सम्पदाएं हैं, परन्तु उन्हें पाकर दूसरों से श्रेष्ठ समझना, उनका भौंडा प्रदर्शन करना, अपने बडप्पन की धौंस देना अहंकार है। अहंकार का प्रदर्शन ही यह बताता है कि व्यक्ति इन सम्पदाओं को हजम नहीं कर पा रहा है। इसी कारण वह ओछेपन के रूप में फूटकर निकल रहा है।

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