अनमोल वचन

अनमोल वचन

वेद हो अथवा पुराण, उपनिषाद हो अथवा गीता, पाप-पुण्य के विषय में सभी एकमत हैं कि ‘परोपकारम् पुणाय पापाय परपीडनम् अर्थात परोपकार करने से पुण्य तथा दूसरों को सताने, पीडा देने से पाप होता है। राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने भी ‘परहित सरिस धर्म नहीं भाई पर पीडा सम नहीं अधमाई कहकर अपने शब्दों में दूसरों को सताने को पाप और परोपकार को धर्म की संज्ञा दी है। परोपकार में दूसरों के हित में किये गये कार्यों के साथ निष्काम भाव से किये गये कर्म भी आते हैं, क्योंकि ऐसे कर्मों से स्वत: ही परोपकार हो जाता है। कुछ प्राप्त करने की इच्छा से की गई सेवा का विशेष महत्व नहीं, शास्त्रों के अनुसार यदि सेवा कत्र्तव्य पालन अथवा आत्मिक उन्नति के लिये की जा रही है, तो वह असली सेवा है, परन्तु यदि किसी लोभ अथवा स्वार्थ पूर्ति के लिये की जा रही है, तो वह आडम्बर मात्र है, इसलिए आडम्बर और पाखंड से दूर रहते हुए मानव मात्र हेतु अपना कत्र्तव्य समझते हुए निष्काम सेवा कर जीवन को सार्थक करें।

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