अनमोल वचन

अनमोल वचन

सन्तोषेव सुखष्य पर निधानम् सन्तोष को सुख की परम औषधि माना है। सन्तोष से प्रयोजन यह है कि पूरी तत्परता, पुरूषार्थ और प्रयत्न से किये गये कर्मों का जो फल प्राप्त हो, उससे अधिक का लोभ न करना। सन्तोष का अर्थ अकर्मण्यता नहीं, आलस्य और प्रमाद नहीं, अपितु अपने कतर्व्य को पूरे पुरूषार्थ से पूर्ण करना और उसका जो फल प्राप्त हो, उसी पर सन्तुष्ट रहना। लालसा और तृष्णा का दास न बनना सन्तोष है। पुरूष का धर्म पुरूषार्थ करना है। कर्म करना तो मनुष्य के अधिकार में है, किन्तु फल ईश्वर के आधीन है। अतएव प्रभु से मिले फल पर तृष्णा न बढायें। इस प्रकार सन्तोष करने से उत्तम से उत्तम सुख मिलता है। तृष्णा जितनी बढेगी, सुख उतना ही कम होता जायेगा। तृष्णा जितनी घटेगी, सुख उतना ही बढेगा। तृष्णा ऐसी आग है, जो सन्तोष के जल के बिना बुझती नहीं। सन्तोष ही इसे शान्त कर सकता है। सन्तोष नहीं होगा तो तृष्णा इतनी भडकेगी कि भीतर बाहर सब भस्म कर देगी।

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