अनमोल वचन

अनमोल वचन

जो हो चुका उसकी स्मृति और जो नहीं है, उसकी चिंता में चित्त अशुद्ध होता है। हो चुका में केवल हमारी स्मृतियां शेष हैं, वह अपने उस रूप में है ही नहीं। बचपन हो चुका, पुण्य होचुका, पाप हो चुका, दुख हो चुका, मित्र-मित्र में, भाई-भाई में, सास-बहु में झगडा हो चुका। झगडा करते समय चेहरे पर कैसे भाव थे, चेहरा कैसा लग रहा था वैसा अब नहीं रहा। उस आवेश की भी केवल स्मृतियां बची हैं फिर क्यों उन्हें याद करके अपने चित्त को अशुद्ध किये जा रहे हो, अपनी शक्ति को क्षीण कर रहे हो। उनके विषय में सोचना ही छोड दें। अपने वर्तमान की सोचें, अपने भविष्य को संवारने की सोचें। वही सोचते रहोगे, जिसके बारे में सोचना नहीं चाहिए तो चित्त विकृत होगा ही, क्योंकि जैसा चिंतन होगा, आचरण भी वैसा ही होगा। कीचड में रहोगे तो फिसलोगे जरूर, आग के पास बैठोगे तो जलोगे जरूर, लडाई झगडे वाले फसादी लोगों के बीच में बैठोगे तो तनाव जरूर आयेगा। अधिक धन कमाओगे तो लोभ लालच भी बढेगा। मन की शान्ति चाहिए तो सोच बदलनी ही होगी। प्रभु का नाम स्मरण कर, उसका मन में ध्यान रखते हुए अपने सांसारिक कर्तव्यों को पूरा करते रहो, निरर्थक बातो में अपना कीमती समय नष्ट न करो। जो समय को नष्ट करता है, समय उसे नष्ट कर देता है।

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