अनमोल वचन

अनमोल वचन

धर्म और नीति एक ही सत्य के दो छोर हैं। तराजू के दो पलडों की भांति हैं, नीति विरूद्ध चलकर धर्म पालन असम्भव है, जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं उठता। मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने भाई लक्ष्मण को, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को, महात्मा विदुर ने दुर्योधन को, चाणक्य ने चन्द्र गुप्त को, भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को यही सिखाया था कि नीतिवान बनो, अनैतिक और बुरे आचरण से दूर रहो, सत्य का साथ दो, सभी प्राणियों से प्रेम करो, कुटिल, कपटी, कुतर्की, धूर्त तथा चालाक व्यक्ति को नीतिज्ञ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। साम, दाम, दंड, भेद को नीति चतुष्टय कहा गया, परन्तु यह नीति कूटनीति है, जो राजा के लिये है, प्रजा के लिये नहीं, क्योंकि राजा को शासन चलाना है, वहां विशेष नीति का पालन राजा की बाध्यता हो सकती है, परन्तु प्रजा अनैतिक मार्ग का न तो अनुसरण करे, न ही ऐसा करने वाले का समर्थन करे, उसे तो सत्य का ही पक्ष लेना चाहिए।

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