अनमोल वचन

अनमोल वचन

anmol-vachan-logoजब परब्रह्म परमेश्वर को भलीभांति जानने वाले ज्ञानी पुरूषों के लिये सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मस्वरूप दृष्टिगोचर होने लगता है, उस अवस्था में उस ज्ञानी पुरूष में प्रत्येक के प्रति मोह, ईष्र्या, शत्रुता, वैमनस्य का भाव समाप्त हो जाता है। जब मनुष्य प्राणी मात्र को अपना ही अंग समझने लगे, अपने से पृथक किसी को जाने नहीं, तब वह किसी से घृणा, द्वेष, ईर्ष्या, वैमनस्य और शत्रुता के भाव क्यों रखेगा। किसी के भी प्रति उसके मन में घृणा नहीं उपजेगी, दुर्भावना पैदा नहीं होगी तो वह अहिंसा का पूर्ण रूप से पालन करेगा। जब उसके भीतर प्रत्येक प्राणी के प्राणों की रक्षा करने का भाव ही रहेगा। किसी के प्राण लेने की भावना कहां से आयेगी। तब अपनी और अपने परिवार की उदरपूर्ति और वैभव की प्राप्ति के लिये किसी को हानि पहुंचाने अथवा हकतल्फी का विचार ही कहां रहेगा, अपितु सब प्राणियों के सुख और कल्याण के लिये अपनी आहूति देने तक की भावना आ जायेगी, यही है वास्तविक अहिंसा और यही है अहिंसा का सच्चा स्वरूप। अहिंसा वास्तव में वीरों का भूषण है, कायरों की दुर्बलता नहीं।
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