अनमोल वचन

अनमोल वचन

anmol-vachan-logoहम अहिंसा को किसी भी परिस्थिति में दूसरों को पीडा न  पहुंचाने के अर्थ में लेते हैं, किन्तु जो दूसरों के प्राणों का हनन कर रहा है, ऐसे मनुष्यों के प्राण लेना हिंसा नहीं, बल्कि अहिंसा को पोषित करना है। अर्थववेद में अहिंसा और हिंसा में भेद समझाते हुए कहा गया है परेणेतु पथा वृक: परमेणोत तस्कर:, परेण दत्वती रज्जू परेणाधायुरर्षतु।। अरे भेडिये मुझसे दूर रहना, अरे चोर मुझसे दूर रहना, ओ सांप मुझसे दूर रहना, ओ पापी मुझसे दूर रहना, सावधान, क्यों मेरे पास आकर अपने जीवन से हाथ धोना चाहते हो। अर्थववेद के अन्य मंत्र में सनादग्ने मृणासि यातु धानान् न त्वा रक्षासि पृतनासु जिग्यु, सहमूराननु दह क्रव्यादो मा ते हेत्या मृक्षत दे व्याया।। सदा ही हे वीर तू राक्षसों का संहार करता आया है। राक्षस तुम्हें युद्धों में जीत नहीं सके। अपनी इस परम्परा को स्थिर रख, उन मार काट मचाने वाले मांस भक्षी राक्षसों को भस्म कर दे। वे तेरी चमचमाती तलवार से बचने न पायें। इन पवित्र मंत्रों में हिंसा का आदेश है। मनुष्य को यह चोला आत्म कल्याण और दूसरों का हित करने के लिये मिला है, यदि इससे दूसरे की अथवा अपनी हानि करने के लिये प्रयोग किया जाने लगे तो ऐसे व्यक्ति का भला इसी में है कि वह चोला उससे छीन लिया जाये। यह हिंसा नहीं वरन हिंसा का अन्त करना है, परन्तु यह कार्य राग द्वेष, ईर्ष्यादि वृत्तियों से उसी प्रकार पृथक होना चाहिए, जैसे कि चीरफाड करने वाले डाक्टर का होता है।
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