अनमोल वचन

अनमोल वचन

anmol-vachan-logoलौकिक आनन्द सिद्धिदायक नहीं। इससे जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता। विचार, बुद्धि, तर्क, विवेक की जो साधारण तथा असामान्य शक्तियां मनुष्य को प्राप्त होती हैं, वे केवल भौतिक सुखों के अर्जन में ही लगी रहें तो इससे  मिलेगा क्या। इनमें ही स्वयं को लिप्त किये रखना कहां की बुद्धिमानी है। जब तक हम यह नहीं जान पाते कि हम कौन हैं, कहां से आये हैं, कहां जाना है, क्या लेने आये थे और क्या लेकर जा रहे हैं, तब तक हमने इस जीवन को मानो नष्ट ही कर दिया। सोचो! क्या हमें आनन्द की प्राप्ति हो गई। हम तो लौकिक सुख को ही पूर्ण आनन्द माने बैठे हैं, किन्तु पूर्ण आनन्द तो वह होता है, जहां विकृति न हो, किसी प्रकार की आशंका, अभाव अथवा परेशानी न उठानी पडती हो। लौकिक आनन्द में तो यही सब कुछ है। स्वाभाविक जीवन में जो आनन्द मिल रहा है, वही हमारी नियति बन गया है, परन्तु सोचना होगा कि क्या वही सच्चा आनन्द है। वास्तव में भौतिक पदार्थों से मिलने वाला सुख तो सच्चा आनन्द हो ही नहीं सकता। सच्चे आनन्द की अनुभूति तो परमेश्वर की प्राप्ति में है। उस मार्ग पर जाने में कुछ कठिनाईयां हैं, परन्तु उस परमानन्द की प्राप्ति के पश्चात वर्तमान की निर्जीव उपलब्धियां तथा भौतिक सुख के साधन जिनमें हम आनन्द की खोज कर रहे हैं, व्यर्थ लगने लगेंगे।
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