अनमोल वचन

अनमोल वचन

anmol-vachanहमारे भीतर भी देवत्व का उदय हो सकता है, बशर्ते कि हमें दूसरों के कष्टों की अनुभूति होने लगे। अपने अहंकार को, प्रभुत्व का त्यागकर श्रेष्ठ मनुष्यत्व को धारण करना सीखा जाये तो हम देवदया के पात्र हो सकते हैं, परन्तु हमारा आचरण इसके विपरीत हो रहा है। हम अपने कष्टों से तो दुखी होते हैं, परन्तु दूसरों को, विशेष रूप से अपने विरोधी को दुखी देखकर सुख का अनुभव करते हैं। निति का वचन है जो स्वार्थ रहित होकर अपने हितों का परित्याग करके नि:स्वार्थ और निष्काम भाव से दूसरों की सेवा को अपना मुख्य धर्म समझते हैं, उत्तम पुरूष कहलाते हैं। जो दूसरों के भले के साथ-साथ अपना भला भी चाहते हैं, मध्यम पुरूष हैं। जो अपनी स्वार्थसिद्धि में दूसरों का अकल्याण करने में संकोच नहीं करते, ऐसे विचार शून्य व्यक्ति दैत्य तुल्य हैं, किन्तु जो निरर्थक निष्प्रयोजन दूसरों को हानि पहुंचाने के चिंतन में ही लगे रहते हैं, ऐसे नर पशु किस श्रेणी में आते हैं, प्रभु ही जानता है।

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