अनमोल वचन

अनमोल वचन

anmol-vachan-logoतोबा या प्रायश्चित का तात्पर्य यह किंचित नहीं कि उसे करने से हमने पूर्व में जो पाप किये हैं वे क्षमा कर दिये जायेंगे, बल्कि यह है कि उससे मन शुद्ध हो जाता है। आगे भविष्य में मनुष्य द्वारा पाप न करने का संकल्प कर लेने से जीवन में पवित्रता आ जाती है। जब हम भविष्य में पाप कर्म नहीं करेंगे तो प्रभु की प्रसन्नता हमें प्राप्त हो जाती है। जैसे गड्ढे में पानी का प्रवाह रूक जाने से वह सड जाता है, उसमें कीडे पड जाते हैं, दुर्गन्ध आने लगती है। इस प्रकार रूके पानी की तरह पाप इकट्ठे हो जाते हैं तो वें अनिष्ट करने लगते हैं। जैसे सडा जल वायु को दुर्गन्धित कर जीवों को रोगी बना देता है उसी प्रकार पापी, समाज और देश के लिए विपत्ति का कारण बन जाता है। जिस प्रकार वर्षा का जल सडे पानी को धकेल कर नदी को पवित्र बना देता है, उसी प्रकार प्रायश्चित रूपी अमृत वर्षा व्यक्ति के पापों को नष्ट कर मन को पवित्र बना देती है, जिससे मन शुभ तथा सत्कर्मों में तत्पर हो जाता है। यदि पापों का प्रायश्चित न किया जाये तो मनुष्य जीवन भर पाप गर्त में पडा रहेगा। उसके लोक-परलोक दोनों ही खराब होंगे। इस जन्म में समाज और कानून का भय त्रास देता रहेगा तथा अगला जन्म भी निकृष्ट योनि में होगा। प्रायश्चित कर लेने पर पुराने पापों का फल कष्ट के रूप में तो अवश्य मिलेगा, किन्तु उन पाप कर्म के फलों की समाप्ति पर सुख की धारा बहेगी तथा वर्तमान जीवन को भी निश्चिंत और निर्भय होकर जीयेगा।

Share it
Top