अनमोल वचन

अनमोल वचन

वसुधैव कुटम्बकम और सर्वेभवन्तु सुखिन: अर्थात समस्त वसुधा अपना ही परिवार है तथा सभी सुखी हों, की कामना और भावना हमारे यहां पुरातन काल से ही रही हैं। हम सभी का जीवन, हमारा स्वाभाव और कार्य व्यवहार सभी में, सबके लिये सुख-शांति, प्रेम और सद्भावना का होना मानवीय चरित्र का द्योतक है। तेरा-मेरा, अपना-पराया और इनकी-उनकी जैसी स्वार्थ की भावनाओं से हम ऊपर उठकर सबके कल्याण और सुख-शांति की कामना करते हुए जीवन को आगे बढाते जायें। इससे जहां अपना भी भला होता है, वहीं पर दूसरों का भी कल्याण होता जाता है। हमारे सभी धर्म ग्रंथों में विश्व कल्याण की कामना की गई है। धर्म वही है, जिससे सबका भला होता है। दूसरों की भलाई में जो अपनी भलाई देखता है, वह विश्व मानव हो जाता है। उसके लिये अपने, पराये और स्वार्थ की भावना किसी भी स्तर पर नहीं होती। सच्चे मानव वे ही होते हैं, जो ऐसी सोच रखते हैं, जो केवल अपने ही बारे में न सोचें, बल्कि सभी के बारे में अच्छा सोचें, यह एक श्रेष्ठ मनुष्य की पहचान है, इसके विपरीत जो केवल अपने विषय में ही सोचते हैं, अपनी स्वार्थ सिद्धि दूसरों के हितों की उपेक्षा तक करके करते हैं, ऐसे स्वार्थी, अधर्मी पृथ्वी पर बोझ ही होते हैं।

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