अनमोल वचन

अनमोल वचन

सभी सुख चाहते हैं, सभी चाहते हैं कि दुख का सामना कभी करना न पडे। इसीलिये सुख के लिये विभिन्न पदार्थों को पाना और उनका संग्रह करना हमारा धर्म बन गया है, किन्तु सुख इन पदार्थों में है ही नहीं। यदि इन पदार्थों में सुख होता तो बडे-बडे चक्रवर्ती सम्राट संसार का त्याग कर वैराग्य न लेते। इन्होंने इस सत्य को जान लिया था कि सुख पदार्थ में नहीं है, आत्मा में ही आवृत है। इसीलिये उन्होंने जगत को ठुकरा दिया। यहां पर प्रश्न उठता है कि क्या आत्मानंद की प्राप्ति के लिये भौतिक सुख साधनों का त्याग अनिवार्य है। इसका सरल सा उत्तर है कि जैसे ही हम आत्मानंद की खोज पर निकलते हैं, वैसे ही ये पदार्थ व्यर्थ बनते चले जाते हैं। जैसे-जैसे हमारी खोज में प्रगति होती है, बाहर के पदार्थों के संरक्षण में संलग्न हमारी तल्लीनता टूटती चली जाती है और बाह्य पदार्थ बिखरने लगते हैं। ब्राह्य पदार्थों को संभालने के लिये निरंतर श्रम और तल्लीनता अपेक्षित है। जब हम भीतर की यात्रा पर निकलते हैं तो उस श्रम और तल्लीनता को आपस में जोडना होता है। ऐसे में बाह्य पदार्थ बिखर जाते हैं। उनका बिखर जाना ही प्रकट तौर पर दिखाई देता है कि उनका त्याग कर दिया गया है।

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