अनमोल वचन

अनमोल वचन

परमात्मा, अतिशय सुन्दर हैं तो अतिशय भयावह भी। वह सौम्य से भी सौम्य हैं तो उग्र से भी उग्र। वह रूद्र हैं तो शिव भी और दोनों साथ-साथ भी। भगवान श्री कृष्ण में परमात्मा के ये दोनों रूप एक साथ प्रकट हुए हैं, इसीलिये तो उन्हें समझने में बडी कठिनाई होती है। उनके व्यक्तित्व में अनेक द्वंदों का जोड है, एक और प्रतिज्ञा करते हैं कि शस्त्र नहीं उठाऊंगा, फिर मौका पडने पर सुदर्शन चक्र उठा लेते हैं। एक ओर युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में प्रथम पूज्य के रूप में पूजा करवाते हैं, दूसरी ओर उसी यज्ञ में झूठी पत्तलें उठाते हैं। आगंतुकों के पांव धोते हैं। एक ओर गीता जैसा महादर्शन योग विद्या, ब्रह्म विद्या का शास्त्र प्रकट करते हैं, तो दूसरी ओर महाभारत का सर्वनाशी, महाविनाशक युद्ध रचाते हैं। अपने जीवन में एक छोर मधुरवंशी की धुन बजाते हैं, दूसरी ओर विनाशक शस्त्र संभालते हैं। इसलिए बडा कठिन हो गया है उन्हें सम्पूर्णता में स्वीकारना। उनके भक्तों ने उनका बंटवारा कर दिया है, कोई बालरूप में स्वीकारता है तो कोई गोपाल के रूप में, किसी के आराध्य बंशी वादक हैं, तो किसी के आराध्य गीता गायक, परन्तु इससे क्या वें तो सम्पूर्ण हैं, एक साथ सब कुछ।

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