अनमोल वचन

अनमोल वचन

anmol vachan logoपरमात्मा की प्रत्येक रचना पूर्ण, निष्पाप और पवित्र होती है। उसकी पूर्ण सृष्टि में पाप उसका बनाया नहीं है, वह मनुष्य कृत है, वह कोई सार वस्तु नहीं, कोई सत्य वस्तु नहीं वरन सत्य का अभाव ही पाप है और इसका वास मनुष्य के मन में है। मनुष्य नहीं जानता कि सत्य नारायण का अंश, उसका पुत्र ‘नर’ हूं। यह न जानना अर्थात इसका अज्ञान ही पाप का कारण है। इसी कारण वह अपने परम पिता के अनुरूप नर से नारायण नहीं बन पाता। मन से, वचन से कर्म से पाप दो प्रकार का होता है। एक भूल से किया हुआ दूसरा जान-बूझकर किया हुआ। अनजाने में होने वाले पाप (भूल) को जिस प्रकार हमारे माता-पिता क्षमा कर देते हैं उसी प्रकार परम पिता भी हमें क्षमा कर देता है, हमें धिक्कारता नहीं, किन्तु जब हम यह जानते हुए कि हम जो कर रहे हैं वह अनुचित है, अन्याय है सत्य के विपरीत है, दूसरों के हितों को हानि पहुंचाने वाला है अर्थात वह पाप है, उसका दण्ड परमपिता परमात्मा हमें अवश्य देगा, उस दण्ड को किसी प्रायश्चित अथवा तौबा से टाला नहीं जा सकता। इसलिए जो कर्म-पाप की संज्ञा में आते हैं उनसे बचकर रहे।

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