अनमोल वचन

अनमोल वचन

anmol-vachanविभिन्न सम्प्रदाय और  उपासना की पद्धतियां अलग-अलग होने के बावजूद कोई भी, कभी भी, कहीं भी किसी प्रकार से भी अपने इष्ट आराध्य का नाम ले सकता है, उसका ध्यान और सुमरन कर सकता है, उसमें खो सकता है, अपने पापों के लिये क्षमा मांग सकता है। परमात्मा सबकी सुनता है, बशर्ते कि हमारे भीतर उसे सुनाने की पात्रता हो। ईश्वर के यहां हमारी प्रार्थना और हमारी क्षमा याचना तभी स्वीकार होती है, जब हम अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की प्रार्थना स्वीकार करते हैं, दूसरों को अपने प्रति की गई त्रुटियों को क्षमा कर भूल जाते हैं। प्रभु बडा दयावान है, वह हमारी असंख्य त्रुटियों को क्षमा करता है। यदि हम भी क्षमा करने का दिव्य गुण धारण कर लेते हैं, तो वह हमें क्षमा करने में उदार हो जाता है, जो किसी को क्षमा नहीं कर सकता, वह क्षमा मांगने का अधिकारी भी नहीं हो सकता। दूसरों की न्यायोचित प्रार्थना को स्वीकार कर अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उनकी सहायता के अनुसार उनकी सहायता करना और क्षमा करना हमारे स्वाभाव का अंग होना चाहिए।
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