अनमोल वचन

अनमोल वचन

anmol-vachanपरमेश्वर की प्राप्ति के लिये श्रद्धा और भक्ति का बहुत बडा महत्व है। श्रद्धा से तात्पर्य है अविश्वास की समाप्ति। जहां अविश्वास समाप्त हो जाता है, वहां भक्ति का आरम्भ हो जाता है। परमात्मा का तेजोमय स्वरूप जो हमारे अन्दर है, उसमें श्रद्धा को जोडने का नाम ही भक्ति है। भगवान की भक्ति रूपी मणि का वास मनुष्य के हृदय में है। मनुष्य जब तक बुद्धि प्रधान बना रहता है, तब तक भक्ति बाहरी दिखावे में ही सिमटकर रह जाती है। बुद्धि तर्क करती है, तोडती है, हृदय जोडता है, वह केवल प्यार करता है। जहां प्यार होगा, वहां तर्क नहीं होता। वहां केवल श्रद्धा होती है। श्रद्धा को बाहरी दिखावे की जरूरत नहीं, जो है, वह है। जब भक्ति परवान चढती है तो भक्त के लिये अपना क्या और पराया क्या। उसकी दृष्टि में सारा जगत ही उस प्रभु की रचना है, मैं भी और मेरा पडौसी भी। उसके लिये मेरा क्या और उसका क्या। वह जानता है कि जो मेरे पास है, वह सब उस परमात्मा का ही दिया है। मन में जन्मा यह भ्रम कि यह मेरा है, मेरा कमाया है, समाप्त हो जाता है, क्योंकि वह सच्चे अर्थों में प्रभु का भक्त बन जाता है।
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