अनमोल वचन

अनमोल वचन

anmol-vachanजिस प्रकार गुड शब्द की रटन करने से मुंह मीठा नहीं होता। गुड को मुंह में डालने से ही उसके स्वाद का पता चलता है। उसी प्रकार परमात्मा के नाम का रटन करने से आनन्द की प्राप्ति नहीं होती उससे नाता जोडने से ही मन को संतुष्टि मिलती है। वह प्रभु ही आत्मा का मूल है जो सारे संसार का आधार है, जो अजन्मा है, जो स्वयंभू है। यह सर्व व्यापी सत्ता ही कण-कण में, घट-घट में व्याप्त है। परमात्मा क्रियाशील होकर भी स्थिर है, जो इसका बोध कर लेते हैं, जो इसके साथ जुड जाते हैं वे ही क्रियाशील रहते हैं, अपने कर्तव्यों को निष्ठापूर्वक पूरा करते हैं, क्योंकि उन्हें यह ज्ञान हो जाता है कि कर्तव्यों को निष्टा से पूर्ण करना ही परमात्मा की भक्ति है। ऐसे लोगों का ही संसार में आना सार्थक होता है। ऐसे लोग ही सहजता से प्रशंसा और निंदा से ऊपर उठ जाते हैं। कोई प्रशंसा करे तो अहंकार में फूलते नहीं यदि निंदा करें तो भी सामान्य रहते हैं। प्रभु के प्रति उनका विश्वास अडिग रहता है। ऐसी देवात्माएं ही भक्ति मार्ग से कभी विचलित नहीं होती, जीवन को सार्थक करती है।

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