अनमोल वचन

अनमोल वचन

गुरू का स्थान भारतीय संस्कृति में माता-पिता के समान ही आदर और श्रद्धा का माना जाता रहा है, किन्तु इस युग में गुरू को वह सम्मान नहीं मिल रहा है। समाज में बहुत अन्तर आ गया है। लोग केवल औपचारिक रूप से गुरू और संत जनों से जुडते हैं। शिष्य को गुरू के अध्यात्मिक जीवन से लाभ उठाने की प्रेरणा लेनी चाहिए। उनके लिये समर्पित, सेवाभावी और निष्ठावान बनना चाहिए। यह भी आश्चर्य है कि गुरूओं के जीवन में भी संयम, नियम और तप की बहुत कमी आ गई है, जो बडी चिंता का विषय है, परन्तु ऐसा होने पर भी ऐसा नहीं है कि गुरू परम्परा का बीज नष्ट हो गया हो अथवा अच्छे संतों की कमी हो गई हो, हां यह अवश्य है कि उनकी प्रतिष्ठा में कमी अवश्य हो गई है। इसके दोषी कुछ तथाकथित गुरू और स्वयंभू भगवान हैं। इन थोडे से सन्तवेषियों ने पूरे संत समाज पर अंगुली अवश्य उठवा दी है। यह एक बडी विडम्बना है कि संतों में उतनी शक्ति भी नहीं रही। अच्छा हो संत समाज ऐसे तथाकथित स्वयंभुओं को चिन्हित करे और उनका बहिष्कार कराया जाये। ऐसे में रघुवंश के गुरू वशिष्ठ को प्रेरणास्रोत बनाकर उनसे सीखकर संतों को आगे बढना चाहिए।

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