अनमोल वचन

अनमोल वचन

संतान के रूप में आज हम कितने कृतघ्र हो चुके हैं कि जो मां बाप अपनी पांच-पांच संतानों का पालन-पोषण अनेक अभावों में रहते हुए भी कर सकत हैं, वहीं पांच-पांच संतानें जीवन में सारे ऐशो आराम से रहते हुए भी उन्हें पालने (सेवा करने) की अपेक्षा उनका बंटवारा कर फुटबाल की भांति कभी इधर तो कभी उधर खाना बदहोशी की तरह घुमाने में लज्जा का अनुभव नहीं करती। माता पिता के आशीष वचनों से बढकर कोई आशीर्वाद हो ही नहीं सकता। उनकी सेवा से बढकर कोई सेवा और कोई पूजा हो ही नहीं सकती। उनके चरणों में नतमस्तक होने से बढकर कोई तीर्थ हो नहीं सकता। गुरू के दर्शन भी हमें तब सुलभ हो सकते हैं, जब मां-बाप चाहे, क्योंकि सर्वप्रथम जीवन में हम मां:बाप के दर्शन करते हैं, उनके द्वारा दिये गये संस्कार ही हमें गुरू के दर्शन को प्रेरित करते हैं। हमारी प्रथम पाठशाला भी मां की वह गोद है, जिसमें सर्वप्रथम आंखें खोलकर इस जगत के दर्शन करते हैं। संस्कारों का बीजारोपण मां की गोद से होता है। माता-पिता की अवमानना करना, उनका अपमान करना, उन्हें दुखी करना अथवा उन्हें तरसाना जीवन के वर्तमान तथा भविष्य दोनों को बर्बाद कर सकता है। जीवन चक्र सतत प्रवाहित होने वाला चक्र है। समय रूकता नहीं, उसके प्रवाह से बचा भी नहीं जा सकता। हम भी कल उसी अवस्था को प्राप्त करेंगे, जहां आज माता-पिता हैं। 

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