अनमोल वचन

अनमोल वचन

हमारे जीवन को उच्चतम शिखर तक पहुंचाने में माता-पिता, दादा-दादी का महान योगदान होता है। माता-पिता एवं बुजुर्गों की श्रद्धा और मन से सेवा करने वाला कभी दुराचारी नहीं हो सकता। जिसने नौ माह तक अपने उदर में रखकर हमारा बोझ झेला हो, जिनकी अंगुली पकडकर, पीठ पर बैठकर हमने चलना सीखा हो, जिनकी लोरियों से दुग्ध पान कर हमने शक्ति प्राप्त की हो, हमारे शरीर का विकास हुआ हो, उनकी उपेक्षा करने वाला मनुष्य जन्म पाकर भी ‘मनुष्य’ कहलाने का अधिकारी नहीं है। हम जीवन में तीर्थों का आनन्द उठाते हैं, तीर्थयात्रा कर स्वयं को धन्य समझते हैं, पुण्य के भागी होने का दावा करते हैं, दान, तप की आराधना करते हैं। मन्दिर-मस्जिद-गुरूद्वारों में पूजा इबादत करते हैं। साधु महात्माओं के आदर्शों की चरण रज माथे पर लगाकर स्वयं को धन्य समझते हैं, परन्तु यदि हमने अपने ही घर में विराजे देवतुल्य माता-पिता एवं बुजुर्गों का सत्कार नहीं किया, उनकी सेवा नहीं की, उनके दुख को अपना दुख नहीं समझा हो तो यह सभी दान-पुण्य, कृत्रिम देवपूजन मात्र एक छलावा ही माना जायेगा। इससे तब तक कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा, जब तक हम अपने बुजुर्गों की आर्शीवाद की पात्रता प्राप्त नहीं कर लेते, जो उनकी सेवा से ही प्राप्त की जा सकती है।

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