अनमोल वचन

अनमोल वचन

प्रभु द्वारा रची इस सृष्टि में सभी अपने कर्मों का फल ईश्वर द्वारा रचित नियमों के अनुसार ही भोग रहे हैं। ईश्वर स्वयं किसी का अच्छा बुरा करने नहीं आता, वह किसी दूसरों को माध्यम बनाकर अपनी व्यवस्था का प्रबन्ध करता है। सारी व्यवस्था नियमबद्ध चल रही है। इस सिद्धांत के आधार पर मनुष्य यदि कोई उपकार या लोक कल्याण का कार्य कर रहा है, तो इसे अपना कार्य न समझकर स्वयं ईश्वर की इच्छा का माध्यम मान लें तो उसकी वृत्ति ही बदल जायेगी। वह किसी की सहायता या उपकार का कार्य कर रहा है तो वह समझ लेगा कि यह शुभ कार्य ईश्वर की प्रेरणा से किया जा रहा है। शुभ कार्य करने से आपको यह लाभ होगा कि आप में मातृभाव और प्रेम की भावना जागृत हो जायेगी। आपमें उदारता का गुण आना प्रारम्भ हो जायेगा। किसी की सहायता करने में दाता और दीन का विचार नहीं आना चाहिए। उदारता दोनों को समान धरातल पर खडा करती है। प्राचीन काल में कहा जाता था कि दान वह है, जो दायें हाथ से दिया जाये, तो बाएं हाथ को पता न चले। आज मूल्यों के क्षरण ने उस मनोरथ और सदिच्छा को विस्मृति के गहरे गर्त में धकेल दिया है। दानी चाहता है कि उसकी कीर्ति का डंका बजे। ऐसा करने से निर्बल, निर्धन की अस्मिता आहत होती है। समाज का सन्तुलन बिगडता है और असन्तुलित समाज किसी को सुख और आनन्द नहीं दे सकता।

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