अनमोल वचन

अनमोल वचन

आगे बढकर लोक उपकार केलिये दान देना, स्कूल, धर्मशाला, धर्मस्थल बनवा देना और निर्धनों की सहायता करना जैसे कार्य पुरातन काल से ही उदारता के लक्षण माने जाते रहे हैं। वर्तमान में किसी की सहायता के लिये अधिकार, क्षमता, सामथ्र्यं से बाहर जाना पडे तो यह बात भी उदारता से जुड गई है। किसी विशेष अवसर पर कोई विशेष योगदान भी उदारता की परिधि में ही आ जाता है। इस उदारता का मूल उद्देश्य कत्र्तव्य से अधिक आत्म प्रशंसा या ख्याति पाना अधिक होता है। इसे लोकेषणा भी कह सकते हैं। किये गये दान या परोपकार कार्य से अपना नाम किसी प्रकार जोड देने की प्रवृत्ति एक सामान्य बात हो चुकी है। दान या उपकार करने वाले की यश वृद्धि हो जाती है, जिससे उसे प्रसन्नता मिलती है। अपनी बडाई कराने के लिये उदारता को अपनाना एक रणनीति की भांति है। मनुष्य का यह दृष्टिकोण बदलना आवश्यक है। जब तक मनुष्य यह सोच रहा है कि उसने कुछ किया है, तब तक उसे समदृष्टि और उससे प्राप्त होने वाले आनन्द की अनुभूति नहीं हो सकती। सृष्टि का पालक तो प्रभु है और दाता भी वही है। जो हमारे पास है, वह सब उसी की देन है और हम जो दे रहे हैं, उसमें हमारा कुछ नहीं। किसी की दी हुई दात में से कुछ वितरण करना और दूसरों की सहायता करना हमारा कत्र्तव्य है। प्रसन्नता मात्र यह होनी चाहिए कि प्रभु ने मुझे उसका निमित्त बनने के योग्य समझा है। उसमें कुछ करने का अहम किंचित भी होना चाहिए।

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