अनमोल वचन

अनमोल वचन

मित्र और मैत्री ये शब्द अपने आप में अत्यंत व्यापक, आनन्दमय और गम्भीर हैं। ईश्वर को भी मित्र कहा गया है, मैत्री ईश्वर से भी की जा सकती है। स्वयं व्यक्ति अपना मित्र होता है, इसका अपना अलग ही दर्शन है। विचारकों के अनुसार जो व्यक्ति अपना स्वयं का सच्चा मित्र होता है तथा जिसकी अपने से सच्ची मैत्री होती है, उसी का जीवन सुख और शांतिमय होता है। आत्मा को आत्मा के द्वारा देखने की बात कही गई है। आत्म साक्षात्कार से बढकर दूसरी कोई भक्ति और कार्य नहीं होता। यही सच्ची मैत्री है। आत्म साक्षात्कार भी वही कर सकता है, जो स्वयं का मित्र हो, अपनी आत्मा का मित्र होना, बनना और आत्मा की कही बातों का मानना ही सबसे बडा जीवन आदर्श और लक्ष्य होना चाहिए। सच्ची मैत्री वही है कि आत्मा के परामर्श को माना जाये। आत्मा सदा ही सत्य, प्रेम, अहिंसा, करूणा और सद्भावना की सीख देती है, पाप कर्मों, नकारात्मक प्रवृत्तियों और हिंसा के कर्मों से दूर रहने की प्रेरणा संकेतों में देती है। आत्मा रूपी मित्र कभी विश्वासघात नहीं करता, इसलिए आत्मा के निर्देशों का संज्ञान लेकर सदा ही उसके अनुसार अपना व्यवहार और आचरण करना चाहिए।

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