अनमोल वचन

अनमोल वचन

इस भौतिकवादी युग में आदमी संवेदनहीन होने के साथ कत्र्तव्य विमुख भी हो गया है। उसका कत्र्तव्य बोध समाप्त हो गया है। मानवता क्या होती है, किस परिस्थिति में उसके क्या कत्र्तव्य हैं, उसे इसका ज्ञान ही नहीं रहा। सडक पर कोई घायल पडा है, उसकी कराहट से भी उसका हृदय नहीं पसीजता। वह मुंह फेरकर चल देता है, उसके हाल पर छोड देता है। कुछ गुंडे किसी महिला के साथ ज्यादती कर रहे हैं, किन्तु आप मूकदर्शक बने रहते हैं अथवा उसे असहाय छोडकर आगे बढ जाते हैं। ऐसी भी घटनाएं होती हैं कि कोई भारी मुसीबत में है, आप मोबाइल से वीडियो तो बना रहे हैं, परन्तु आपके हाथ उसकी सहायता को नहीं उठते। सद्कत्र्तव्य और कुछ नहीं, बल्कि मानव धर्म का पालन करना है। महर्षि दयानंद किसी स्थान पर विराजमान थे। उन्होंने देखा कि एक मजदूर सामान से लदे ठेले को चढाई पर ले जा रहा था। भार अधिक होने के कारण प्रयासों के बावजूद वह आगे नहीं बढ पा रहा था। नाराज मालिक बेंत से उसे पीट रहा था। महर्षि उठे और ठेला आगे बढाने में उसकी मदद की। यह दृश्य देखकर सेठ हाथ जोडकर महर्षि के सामने खडा हो गया, क्षमा मांगने लगा। महर्षि ने कहा कि यह तो उनका कत्र्तव्य और धर्म था, किन्तु आज पुल की चढाई पर मानव चलित रिक्शे में बैठी सवारी थोडी दूर भी नीचे उतरकर पैदल चलकर मानवीयता का परिचय भी नहीं दे पाती।

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