अनमोल वचन

अनमोल वचन

परमात्मा सर्वोच्च सत्ता है, इसलिए उसकी समस्त रचनाएं दोषरहित हैं, श्रेष्ठ हैं। ईश्वर ने प्रत्येक जीव को कुछ दिया है। मनुष्य इसके बाद भी सन्तुष्ट नहीं और ईश्वर सत्ता और व्यवस्था में किसी न किसी भांति दखल देता रहता है। मनुष्य सोचता है कि वह इससे उत्तम परिस्थितियां उत्पन्न कर सकता है। उसने पहाड, जंगल काट डाले, नदियों के रूख मोड दिये और खनिजों का बेतहाशा दोहन कर रहा है। वह प्रकृति पर नियंत्रण करना चाहता है। वह अपनी गढी हुई परिभाषा के अनुरूप सुख प्राप्त करना चाहता है। यह उस परमात्मा के प्रति अविश्वास है। सृष्टि में जो कुछ भी प्रचुरता में है और जीव के उपभोग के लिये है। सामान्य उपभोग से न तो फल वनस्पतियों और खाद्यान्न समाप्त होने वाले हैं और न जल। वायु भी कभी चुकने वाली नहीं है, परन्तु मनुष्य के अविवेक और अधीरता ने इन पर संकट खडा कर दिया है। मनुष्य अपने प्रारब्ध से अधिक पाना चाहता है, वह भी ईश्वरीय व्यवस्था को भंग करके। वह कितना भी चातुर्य दिखाये, ईश्वर की उच्चता को नहीं पा सकता। वह आंखें बंद करके जिस प्रकार प्रकृति का दोहन कर रहा है, उसे प्रकृति के कोप का भाजन बनना ही पडेगा। अपने अहंकार के चलते वह अपने विनाश की ओर बढ रहा है। दुख तो वह अब भी झेल रहा है, भविष्य में तो उसे माथा पकडकर पछताना पडेगा। यदि वह समय रहते चेत जायें तो यह उसी के हित में है।

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