अनमोल वचन

अनमोल वचन

आचार्य चार्वाक का एक प्रसिद्ध वचन है ‘जब तक जियें सुख से जीयें, ऋण लेकर भी घी पीते रहें। यद्यपि चार्वाक दर्शन की अपने समय में बहुत आलोचना हुई थी। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें चरित्र, श्रम एवं नीतिपूर्वक धनोपार्जन के स्थान पर येन-केन-प्रकारेण धन कमाने पर बल दिया गया है। खेद का विषय है कि वर्तमान परिपेक्ष्य में सम्पूर्ण विश्व ही चार्वाक दर्शन पर अमल कर रहा है। अपने ही राष्ट्र में मध्यम वर्ग अनाप-शनाप ऋण लेकर भौतिक आवश्यकताएं पूरी कर रहा है, मनी फैक्टर के चलते रिश्तों को ताक पर रखकर इकाई-दहाई -सैंकडों में उलझा हुआ है। स्थिति इतनी भयानक हो गई है कि व्यक्ति धन के लिये एक-दूसरे के रक्त का प्यासा बना हुआ है। ईमानदारी एवं निष्ठा कहीं कोने में पडी अश्रु बहाने पर विवश है। मानव केवल धन की लालसा में दिन-रात एक किये हुए है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानव को अपने भविष्य में ही विश्वास नहीं है। शायद इसीलिये वह आंख बंद किये, बिना सोचे समझे, अच्छे-बुरे का विचार न कर धन के पीछे भाग रहा है। इस अंधी दौड का परिणाम यह हो रहा है कि आज समाज में परिवारों में रिश्तों की मर्यादा तार-तार हो रही है और जिन सामाजिक मूल्यों को हम भारतीय संस्कृति के आधार बिन्दू मानते थे, वे मृतप्राय: हो गये हैं।

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