अनमोल वचन

अनमोल वचन

यह सर्वमान्य सत्य है कि प्रत्येक जीव ईश्वर का अंश हैं, तो फिर क्या कारण है कि जीवन में मानसिक संताप, शोक, चिंता और व्यग्रता अपना आधिपत्य जमा लेती है। क्यों जीव ईश्वर का अंश होते हुए भी ईश्वर से दूर हो जाता है, क्यों वह कठिनाईयों में पड जाता है, चिंता और शोक में डूब जाता है। समझने के लिये यह दृष्टांत प्रासांगिक है- मकडी अपना जाल बनाना आरम्भ कर देती है, बनाते-बनाते जब जाल बडा हो जाता है तो वह मकडी स्वयं अपने बनाये जाल में घिर जाती है। जाल से निकलने के सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। इसी प्रकार मनुष्य जब शिशु रूप में जन्म लेता है, वह ईश्वर के बहुत निकट होता है, क्योंकि वह अपने चारों ओर कोई जाल बनाने में समर्थ नहीं है, परन्तु वह ज्यों-ज्यों दुनिया से परिचित होने लगता है, तो स्वयं अपनी दुनिया बसाता और उजाडता रहता है, फलत: वह ईश्वर से दूर होता चला जाता है। जो लोग प्रकृति से दूरी बनाकर रहते हैं, उनका जीवन संकटों से घिर जाता है। प्रकृति हमारी माता है, हम उसकी सन्तान। मां को अपनी सन्तान बहुत प्यारी होती है, परन्तु सन्तान के भी तो कुछ कत्र्तव्य हैं। यदि हम प्रकृति रूपी मां का अनुचित दोहन न करें, प्रकृति से जुडकर रहें तो हम भी शांत और निर्मल रह सकते हैं, परन्तु प्रकृति से जुडने के लिये बच्चे की भांति अबोध होना पडेगा अर्थात नकारात्मकता, राग, द्वेष से दूर रहें, ताकि मन में निर्मलता बनी रहे।

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