अनमोल वचन

अनमोल वचन

साधु केवल गेरूआ अथवा श्वेत वस्त्रों (श्वेताम्बर जैन साधु) में ही नहीं होते, साधु केवल आश्रमों, मठों, स्थानकों अथवा तीर्थों में नहीं होते, साधुत्व किसी में भी समाया हो सकता है। अपने दुखों को भूलकर दूसरों की व्यथा में साझीदार होना, शान्ति बनाये रखने के लिये अपमान का घूंट पी जाना, अपने पेट की भूख को दबाकर दूसरों के मुंह में कौर रखना और उत्तेजनात्मक परिस्थितियों में भी शांत रहना आदि जाने कितनी मानवीय अभिव्यक्तियां साधुत्व की परिभाषा बन जाती हैं। मानव जाति ही नहीं, पशुओं तक के प्रति चुपचाप नि:स्वार्थ भाव से ओतप्रोत होना किसी के भीतर साधु होने का पर्याप्त प्रमाण है। एक विद्यार्थी या कर्मचारी के लिये सत्य और अन्य नैतिक मूल्यों से समझौता किये बिना सफलता की ऊंचाईयों को छूना अपने में साधुत्व के लक्षण हैं। यह मानना होगा कि आज समाज की दुर्भाग्यपूर्ण कुरीतियों, दोषों का अन्त कोई न्यायिक दंड नहीं कर सकता। इसका स्थायी समाधान अपराधी के भीतर साधुत्व को जगाने से ही सम्भव है। जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अपने भीतर के साधुत्व को पहचानें, उसे विकसित करें, तभी जग में प्रेम और माधुर्य स्वयं ही फैल जायेगा। शत्रुता के भाव समाप्त हो जायेंगे।

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