अनमोल वचन

अनमोल वचन

हिंसा को प्रथमदृष्टया किसी को मारना, पीटना, खून खराबा करने के अर्थ में ही माना जाता है। मोटे तौर पर यह सही भी है, क्योंकि ऐसे कार्यों में लगे व्यक्ति का जीवन अशांत रहता है। हिंसा का आध्यात्मिक पक्ष इससे भी गम्भीर है, शास्त्रों में क्रोध, द्वेष, कटुवचन, निंदा आदि अवगुण तामसिक श्रेणी में शामिल किये गये हैं। ये सब हिंसा के ही अस्त्र-शस्त्र हैं। व्यक्ति जब इनका प्रयोग करता है तो दूसरों से अधिक अपनी ही हानि करता है। क्रोध तो वह घातक अस्त्र है, जो सबसे पहले क्रोध करने वाले का ही खून जलाता है, शरीर को दुर्बल बनाता है। क्रोधी कई बार अवसाद का रोगी हो जाता है। आयु बढने के साथ भूलने की बीमारी से ग्रस्त हो जाता है, इसीलिये ऋषियों मुनियों ने अहिंसा परमोधर्म का सूत्र वाक्य दिया है। श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को ज्ञान देते हुए अप्रिय और कटु वचनों से बचने का परामर्श दिया था, इसलिए हर व्यक्ति को नकारात्मक प्रवृत्तियों से बचना चाहिए। क्रोध और कटु वचनों के स्थान पर प्रभु भजन कर मन को सशक्त बनाना चाहिए। जो व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही हो जाता है। यदि हम सकारात्मक चिंतन को मन में प्रश्रय दें तो हिंसा सरीखे नकारात्मक विचार मन में स्थान बना ही नहीं पायेंगे।

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