अनमोल वचन

अनमोल वचन

आप में से अनेक मंदिरों, गुरूद्वारों में अवश्य जाते होंगे अपनी कामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना के लिये, क्योंकि लगभग सभी कामनाओं से भरे हैं। ऐसे तो बहुत कम हैं, जो मात्र भक्ति भाव से जाते हैं। संख्या ऐसे लोगों की अधिक मिलेगी, जो इसलिए जाते हैं कि समाज में लोग कहें कि वह बहुत ईश्वर भक्त है। दान करना आदमी का अनिवार्य कत्र्तव्य है। इस कारण कम लोग हैं, जो गुपचुप दान करते हैं। ऐसे दानियों की संख्या अधिक है, जो इसलिए दान करते हैं, ताकि लोग उन्हें दानवीर कहें। हम अपने लिये कभी यह पाने की चाहत रखते हैं, कभी वह पाने को लालायित रहते हैं, पर जब मन्दिर जाते हैं तो हमारे पास कोई न कोई चाहत अवश्य होती है। जो भक्त होता है, वह तो प्रभु के सम्मुख आत्म समर्पण कर देता है। भक्त तर्क नहीं करता, क्योंकि ‘वह’ तो तर्क से बाहर की चीज है। दो ही बातें हैं या तो आप आध्यात्म के माध्यम से परमात्मा की अनुभूति करें अथवा परमात्मा को साक्षात देखना चाहते हो तो आत्म समर्पण कर दें। यह निर्भर आप पर करता है कि आप परमात्मा को किस रूप में देखना चाहते हैं। आप इसे ‘शिव’ (कल्याण करने वाला) रूप में देखना चाहते हैं अथवा कामना पूर्ति के लिये व्यापारी के रूप में।

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