अनमोल वचन

अनमोल वचन

सर्वेभवन्तु सुखिन: सर्वेसन्तु निरामया तथा सर्व जन हिताय सर्वजन सुखाय भारतीय संस्कृति का यही संदेश है और यह संस्कृति वेदों पर आधारित है। वेद का ऋषि केवल भारत के लोगों के लिये सुख और स्वास्थ्य की कामना नहीं करता, वह भूमंडल पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी के लिये प्रभु से प्रार्थना करता है। किसी की आस्था किस धर्म, सम्प्रदाय अथवा कौन किस देश का रहने वाला है, का विचार न कर उसकी प्रार्थना सबके लिये है। उसके पावन चिंतन उसके पावन संकल्पों को आध्यात्मिक आयाम प्रदान करते हैं। वेद के ऋषि कहते हैं कि हम निरंतर श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होते रहें, प्रकाश को ग्रहण करें और अंधकार से दूर रहकर प्रकाशमान हो जायें। अज्ञान अंधकार है और ज्ञान प्रकाश पुंज। यही कारण है कि मानवता को सभ्यता और संस्कृति का प्रथम गुंजन भारत की पवित्र धरती से ही सुनाई दिया। भारतीय आध्यात्मिक मनीषियों ने केवल ज्ञान को ही श्रेष्ठता का मानक स्वीकार नहीं किया, धीरता और विनम्रता को भी प्रत्येक उच्चता का आधार माना है। व्यक्ति तब तक निजित्व की सीमा से बाहर नहीं आ सकता, जब तक वह अहंकार की कठोर दीवारों से घिरा है। स्व से पर की यात्रा ही व्यक्ति को सार्वभौमिक सत्य से जोडती है। इसीलिये मानव को आत्म केन्द्रित न होकर समष्टि (सम्पूर्ण समाज) के चिंतन मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जाती है।

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