अनमोल वचन

अनमोल वचन

क्या कभी आपने अपने बारे में सोचा है कि मैं कौन हूं, क्या यही है मेरा स्वरूप, जो इस पंच भौतिक स्थूल शरीर के रूप में दृष्टिकोचर हो रहा है। सोचे क्या साढे तीन हाथ लम्बा, अमुक रंग रूप युक्त देह पिंड ही ‘मैं हूं’ है, परन्तु देह तो स्थिर नहीं रहती, यह तो नश्वर है, कितनी ही अवस्थाएं बदलती रहती हैं, यह परिवर्तनशील देह किसी भी रूप में तो यह विश्वसनीय नहीं। परिवर्तनों के इसी क्रम में एक दिन ऐसा भी आता, जब जीव इस देह को छोड जाता है और निर्जीव देह रह जाती है शमशान में जलाने योग्य। क्या मूल्य रह जाता है उस समय इसका। लकडियों की ही भांति राख की ढेरी में परिवर्तित हो जाता है इसका अस्तित्व। तत्व तत्वों में समा जाते हैं। उस स्थिति को सामने लाइये, क्या यह राख की ढेरी अथवा अस्थियों के कुछ अवशिष्ट ही ‘मैं हूं’, इसी भाव पर ठहरिये शमशान में चिता की उठती हुई लपटें, उसमें जलता हुआ शरीर, फिर मात्र राख की ढेरी, उसमें कुछ अस्थियां, जिन्हें तीसरे या चौथे दिन छोटी सी थैली में डाल ली जाती है खेत में, बाग में, भूमि में दबाने अथवा गंगा में विसर्जित करने के लिये। इस सच्चाई को जानते हुए भी ‘मैं कौन हूं’ को जानने का प्रयास भर नहीं करते, किन्तु ‘मैं मैं मैं’ की रट अवश्य लगाते हैं।

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