अनमोल वचन

अनमोल वचन

मनुस्मृति का एक श्लोक है ‘पारूष्यमनृतं चैव पै शून्य यू चापि सर्वश: असम्बद्ध प्रलापश्च वांड़मय स्याच्चतुर्विधम् अर्थात वाणी में कठोरता, झूठ बोलना, परनिंदा करना और व्यर्थ अप्रासांगिक बातें करना- ये वाणी के चार दोष हैं। इन दोषों से बचे रहने वाला व्यक्ति सदा सुखी और सन्तुष्ट रहता है। वाणी को प्रभावशाली और वाकचातुर्यपूर्ण बनाने के लिये इन चारों दोषों को सर्व प्रथम त्यागना चाहिए, बातचीत को नियंत्रित करने का माध्यम मनुष्य की सोच है। सोच यदि रचनात्मक और नियमित है तो व्यक्ति सहजता से ही सफलता की ओर अग्रसारित हो जाता है। वह अपनी बातचीत से सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेता है, इसलिए बातचीत को केवल बोलने का माध्यम ही नहीं, बल्कि सफलता का एक सूत्र भी मानना चाहिए। ज्ञानी जनों का कथन है कि साधारण से विशेष बनने का गुर (सूत्र) सिखाने और आजमाने वालों में केवल यही अन्तर है कि एक केवल बोलता है और दूसरा उसे व्यवहारिक रूप देता है, जिससे सफलता मिलती है, इसलिए जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिये सबसे पहले वाक संयम तथा वाकचातुर्य के महत्व को समझकर व्यवहारिकता का परिचय देना आवश्यक है।

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