अनमोल वचन

अनमोल वचन

बुद्धिमान वे हैं, जो बोलने से पहले सोचते हैं और मूर्ख वे हैं, जो बोलने के बाद सोचते हैं। बहुधा हम सभी एक मूर्खता कर जाते हैं कि आवेश में किसी को कुछ भी बोल जाते हैं और बाद में उसकी हानि उठाने को बाध्य होते हैं, पछताते हैं कि ऐसा क्यों बोल गये, न बोलते तो अच्छा होता। इसलिए बातचीत की कला में धैर्य और समझदारी का गुण अत्यावश्यक है। प्रभावशाली बातचीत एक दुर्लभ गुण हैं, वाक्चातुर्य थोडे लोगों में होता है। ये गुण सरलता से यों ही प्राप्त नहीं हो जाते। बातचीत की कला से व्यक्ति शत्रु को भी मित्र बना सकता है, इसलिए वार्ता की कला में वाणी के संयम पर अत्याधिक जोर दिया गया है और श्रेष्ठ तप माना गया है। मनीषियों ने भी सदा सत्य और मृदु वचन बोलने की प्रेरणा दी है। उपनिषदों में कहा गया है ‘तत सत्ये प्रतिष्ठितम्’ अर्थात ब्रह्म सदा सत्य से प्रतिष्ठित होता है। सत्य पर अटल रहने से वाणी से, मृदु प्रेम भरे वचन उच्चारित करने से मनुष्य सभी को मित्र हितैषी बनाने में सफल रहता है। वेद का ऋषि कहता है ‘जिव्हया अग्रे मधु में’ अर्थात मेरी जिव्हा के अग्र भाग पर माधुर्य हो और मैं मधु बोलूं। तुलसी दास जी कहते हैं ‘तुलसी मीठे वचन ते सुख उपजत चहु ओर, वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर।’

Share it
Top