अनमोल वचन

अनमोल वचन

धन चाहे किसी भी मार्ग से कमाया जाये, उसकी तीन ही गति हैं दान, भोग, नाश अर्थात कमाये धन से पहले दान, फिर निजी कार्यों में उसका सदुपयोग किया जाये अन्यथा वह नाश को प्राप्त होता है। पुरूषार्थी के लिये तो धन हाथ का मैल है। जिस कार्य के लिये वह भ्रम करता है, उसकी सफलता ही उसका पुरस्कार है। जिस आदमी के चिंतन में सदैव धन ही धन रहता है, वह अपने बैंक बैलेंस को बढते देखकर अति प्रसन्न होता है, अपने परिश्रम की सफलता को देखकर वह फूला नहीं समाता। बढते धन को देखकर चाहे वह कितना भी खुश होता हो, परन्तु यदि वह न दान करता है, न उसका सही उपयोग करता है, तो वह धन उसके लिये व्यर्थ है। यदि धन को होनहार पुरूषार्थी उत्तराधिकारियों का संरक्षण प्राप्त नहीं होता तो वह धन नष्ट हो जाता है। अधिक धन मनुष्य को अंधा और दम्भी बना देता है। अमीरों और धनियों की भी अपनी मुश्किलें हैं। हरदम उन्हें अपने धन की रक्षा की चिंता बनी रहती है कि आगे इसको सम्भालने वाला अच्छा जिम्मेदार उत्तराधिकारी होना चाहिए। निन्यानवे के फेर में पडकर वे धन का सदुपयोग ही भूल जाते हैं। बढता हुआ धन ही उनकी चिंताओं का कारण बन जाता है। धन की जिस अपारता में उन्होंने सुख और प्रसन्नता ढूंढी थी, वही उनके दुख का हेतु बन जाता है। परिश्रम और ईमानदारी से चाहे जितना धन कमा लो, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और भविष्य निधि के रूप में कुछ अंश रखकर शेष परहित और सतकार्यों में लगाते रहो और सब कुछ तो यहीं रह जायेगा, केवल सत कार्यों में लगाया धन ही आपकी पूंजी है, जो पुण्य कार्यों के रूप में आपके साथ जायेगी।

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