अच्छे बीजों की तरह जरूरी है अच्छे विचारों का चुनाव भी

अच्छे बीजों की तरह जरूरी है अच्छे विचारों का चुनाव भी

जिस प्रकार वृक्ष के उगने के लिए बीज अनिवार्य है उसी प्रकार हर कार्य के मूल में भी एक बीज होता है और वह है विचार। जैसा बीज वैसा पौधा तथा जैसा विचार वैसा कर्म। मनुष्य हर कर्म किसी न किसी विचार के वशीभूत ही करता है अत: विचारों का बड़ा महत्त्व है। जैसे विचार वैसे कर्म तथा जैसे कर्म वैसा जीवन। विचार ही हमारे जीवन की दशा और दिशा निर्धारित करते हैं।
विचारों का उश्वम स्थल है हमारा मन, अत: मन पर नियंत्रण द्वारा हम ग़लत विचारों पर रोक लगा सकते हैं तथा अच्छे विचारों से मन को आप्लावित कर सकते हैं। यदि जीवन रूपी बगिया को सुंदर बनाना है, उसे रंगों से
सराबोर करना है तथा उसे भीनी-भीनी गंध से गमकाना है तो मन रूपी बगिया में चुन-चुन कर अच्छे विचार बीजों को बोइए, सकारात्मक सोच के पौधे लगाइए।
बाल कथा अहिंसा का जादू
प्राय: कहा जाता है कि पुरुषार्थ से ही कार्य सिद्ध होते हैं, मन की इच्छा से नहीं। बिलकुल ठीक बात है लेकिन मनुष्य पुरुषार्थ कब करता है और किसे कहते हैं पुरुषार्थ? पहली बात तो यह है कि मन की इच्छा के बिना पुरुषार्थ भी असंभव है। मनुष्य में पुरुषार्थ या हिम्मत अथवा प्रयास करने की इच्छा भी किसी न किसी भाव से ही उत्पन्न होती है और सभी भाव मन द्वारा उत्पन्न तथा संचालित होते हैं। अत: मन की उचित दशा अथवा सकारात्मक विचार ही पुरुषार्थ को संभव बनाता है। पुरुषार्थ के लिए उत्प्रेरक तत्व मन ही है।
कई व्यक्ति तथाकथित पुरुषार्थ तो करते हैं लेकिन फिर भी सफलता से कोसों दूर रहते हैं। एक श्रमिक कितना परिश्रम करता है लेकिन क्या उसका परिश्रम या पुरुषार्थ अपेक्षित कार्य-सिद्धि प्रदान कर पाता है? कार्य-सिद्धि अथवा सफलता या लक्ष्य-प्राप्ति पूर्ण रूप से पुरुषार्थ पर नहीं, मन की इच्छा पर निर्भर हैं।
मन को किसी सकारात्मक उपयोगी विचार से ओतप्रोत कर लो तो उससे असीमित लाभ संभव है। जैसा विचार वैसा लाभ। सुख-दुख की अनुभूतियाँ मन में उत्पन्न विचार की ही देन हैं। स्वास्थ्य विषयक सकारात्मक विचार स्वास्थ्य तथा आरोग्य प्रदान करेंगे तथा समृद्धि के प्रति विश्वास से ओत प्रोत विचार समृद्धि देंगे।
फलों और सूखे मेवों द्वारा संभव है रोगोपचार
कुछ लोग केवल भौतिक सुख और आर्थिक समृद्धि चाहते हैं। उनको यह सब मिलता भी है लेकिन वास्तविक सुख और संतुष्टि नहीं। यदि जीवन में संतोष की कामना करोगे तो संतोष भी मिलेगा और संतुष्टि के सामने मात्र भौतिक सुख और समृद्धि कोई मायने नहीं रखते। अत: मन को संतुलित सकारात्मक विचारों से ओत प्रोत रखना ही श्रेयस्कर है और यही अभीष्ट भी।
– सीताराम गुप्ता

Share it
Top